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अपने कैरियर में मनोज कुमार साहब ने फ़िल्मी हीरोइन को कभी गले नहीं लगाया : संजय साग़र

अपने कैरियर में मनोज कुमार साहब ने फ़िल्मी हीरोइन को कभी गले नहीं लगाया : संजय साग़र

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क़लमकार। देशभक्त भारत कुमार, पंडित जी यानी अभिनेता मनोज कुमार साहब ने अभी पिछले महीने अपने जीवन के 85 साल पूरे किए हैं। मनोज कुमार जी की फिल्मों का संगीत उनकी सबसे बड़ी खूबी थी, उनके गाने आज तक सुने जाते है। उपकार हिट होने के बाद से उस फिल्मी भारत के चरित्र से बाहर नहीं निकल पाये, चाहे स्क्रिप्ट कैसी भी रही हो, शोर दो बदन मेरी फेवरेट है शहीद लाजवाब बनी। मनोज जी बेहद भावुक चेहरे से अभिनय करते थे और दिलीप कुमार को जरूरत से ज्यादा पसन्द करते थे। वे शतायु हों।

मनोज कुमार का असली नाम हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी था। ये दिलीप कुमार साहब के बहुत बड़े फैन थे। उनकी एक फिल्म शबनम में दिलीप साहब का नाम मनोज था सो उन्होंने बचपन में तय कर लिया था कि वो जब भी फिल्मों में आयेंगे वो अपना फिल्मी नाम मनोज कुमार ही रखेंगे। 24 जुलाई 1937 को पाकिस्तान वाले हिस्से एबटाबाद में जन्मे वही एबटाबाद जहां से ओसामा बिन लादेन को अमेरिकीयों ने मार गिराया। बाकी पंजाबियों की तरह विभाजन के बाद दिल्ली आ बसे। हिंदू कॉलेज में पढ़े, फिल्मों का शौक हुआ तो बॉम्बे आए और फिर यही के होकर रह गए। पहली कामयाबी हरियाली और रास्ता में मिली, राज खोसला साहब की दो बदन वो कौन थी ने उन्हे अलग पहचान दिलाई। मनोज कुमार ने कभी फिल्मी हीरोइन को गले नहीं लगाया। इसी वजह से उनका पंडित जी नाम ही मशहूर हो गया। मनोज कुमार जी का फिल्मी स्टाइल 1967 में आई उपकार फिल्म से बदल गया इस फिल्म से वो अपने समकालीन एक्टर्स से अलग पहचान बना गए। उपकार से पहले शहीद में वो ये जलवा दिखा चुके थे पर उपकार ने उन्हे बतौर देशभक्त भारत कुमार के नाम से इस्टेब्लिश कर दिया। 85 साल बहुत उम्र होती है, क्रांति फिल्म के दौरान वो अपनी पीठ के दर्द से परेशान रहते थे। इस कारण उसके बाद उन्होंने अपनी फिल्मी गतिविधियां सीमित कर ली थी। फिल्मे तो पहले से ही कम करते थे साल में दो या तीन उस दौर में जब एक्टर्स काफी फिल्मे कर लिया करते थे। हर एक्टर की एक फिल्म उसकी लाइफ का टर्निंग प्वाइंट होती है। जैसे देव साहब की गाइड अमिताभ बच्चन की जंजीर और मनोज साहब की उपकार वैसी ही फिल्म थी। फ़िल्म उपकार हर स्कूल में पार्कों बाग बगीचो में सड़क मुहल्लो में सरकार प्रोजेक्टर लगा लगा कर लोगो को दिखाती थी। इस फिल्म में वो सब कुछ था जो हमारी जिंदागियो में होता है। महंगाई, बेरोजगारी परिवारिक कलह देश की सीमा की समस्या, काला बाजारी, जमाखोरी गांव बेहतर या शहर सब कुछ था। और ये फिल्म खुद मनोज कुमार साहब ने लिखी और निर्देशित की थी। और क्या फिल्म बनाई थी मनोज साहब ने वाह तथा दूसरी फिल्म बनाई पूरब और पश्चिम जिस पर बाद में नमस्ते लंदन बनी अक्षय कुमार की, पूरब और पश्चिम में मनोज विदेश जाते है दादा अशोक कुमार से आशीर्वाद लेते है। दादा बोलते है – बेटा एक जमाना था जब विदेशों से बच्चे यहां पढ़ने आते थे और एक जमाना है जब हम बाहर जा रहे है ज्ञान लेने, मनोज कुमार बोलते है दादा जी ज्ञान नही विज्ञान लेने बाहर जा रहे है। इस एक वाक्य ने आने वाले नए भारत की बुनियाद रख दी थी। ये एक सपना था उस समय जो आज सच है, आज आई टी की दुनिया में हमारा बोलबाला है। लंदन के एक रेस्त्रां में मनोज साहब प्राण के साथ बैठे है, सामने की टेबल पर एक आदमी रुहांसा बैठा है मनोज साहब पूछते है ये ऐसे क्यों बैठा है..? प्राण साहब बोलते है इसके पिता की मौत हो गई है इसको एक संदेश मिला है अब ये यहां पर शोक मना रहा है। मनोज साहब बोलते है सिर्फ संदेश मिला, गया नही ये। प्राण साहब बोलते है यहां किसी के पास टाइम नही। कोविड काल मे आज हम भारत में ये देख चुके है। हज़ारों हजार लोगों ने महज एक व्हाट्स एप संदेश से मौत का अफसोस जाहिर किया। अंतिम क्रिया के संदेश भी व्हाट्स एप पर आजकल आते है। समय कितनी तेजी से बदलता है जिसे मनोज साहब पश्चिम की नजर से देख रहे थे, वो आज भारत में हो रहा है। शोर फिल्म मे बाप की एक ही कोशिश है बेटे की आवाज सुनना और जब वो बोलने लगता है तो मनोज साहब की सुनने की ताकत चली जाती है। रोटी कपड़ा और मकान में आज के कृषि कानूनों की भयावहता को दिखाने की कोशिश की अगर जमाखोर अनाज जमा कर देश में महंगाई ला दे उसके दाम तय करे, तो ? जमा खोर व्यापारी मदन पुरी बड़े व्यंग्य की तरीके से 15 अगस्त की भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की स्पीच सुनता है जिसमे वो महंगाई की बारे में बोल रही है। बेरोजगारी का महंगाई का ईशु इस फिल्म में भी था। अपने भाई अमिताभ बच्चन को इंडिया गेट के सामने थप्पड़ मारते हुए बोलते है भूखे मर जाओ लेकिन रिश्वत मत लो, फिर एक दिन यही हीरो गलत राह पर चलना शुरू कर देता है।

क्या आप जानते हैं कि स्ट्रगल के दिन थे मनोज कुमार के भी और धर्मेंद्र के भी एक दिन दोनो गुरुदत्त के यहां मिले काम के सिलसिले में टाइम दिया हुआ था गुरुदत्त जी ने लेकिन किसी कारणवश नही मिल पाए दोनों इंतजार करते रहे। करीब दो घंटे बाद उनके नौकर ने आकर बताया कि आज साहब नही मिल पाएंगे। उनके पास टाइम नही हैं। तब मनोज कुमार ने धर्मेंद्र को कहा चलो चलते है। टाइम अभी हमारा नही आया है इसलिए किसी के भी पास टाइम नही है मेरे भाई। ऐसी मनोज साहब की शख्सियत है, बाद में दोनो एक फिल्म शादी में भी नजर आए। जब प्राण साहब विलन का रोल करते थे। पंडित जी ने उनको उपकार में मलंग बाबा का रोल देकर उनके कैरियर को ही पूरी तरह बदल डाला। कामिनी कौशल उनकी फेवरेट फिल्मी मां थी लेकिन क्रांति में उनकी मां बनी निरूपा राय क्योंकि दिलीप साहब कामिनी कौशल के साथ कम्फर्ट नही थे उनकी पुरानी आशिकी थी किसी ज़माने। दिलीप साहब को क्रांति में पहली बार कैरेक्टर रोल में प्रस्तुत किया मनोज साहब ने ये फिल्म 6 ट्रेक में बनाई। 6 ट्रेक उस ज़माने में भी और आज भी एक अजूबा थी। जैसे एक कोने से कोई कलाकार चल कर परदे के दूसरे कोने में डायलाग बोलता था तो उसकी आवाज भी दुसरे कोने से सुनाई पड़ती थी, उसके चलने के साथ साथ आवाज भी साथ चलती। इससे फिल्म देखने का मजा दुगना हो गया था। फिल्मों के दीवाने लोग हमेशा से फिल्म को थियेटर का प्रमुख माध्यम मानते हैं। फिल्म देखने का असली मजा सिनेमा घर ही है ना की ओटीटी या टीवी पर देखने मे नहीं। कलयुग की रामायण में बड़ा ही विवादास्पद विषय उठाया कि हम अपने बच्चो के नाम भगवान या अवतारों के नाम पर रख तो देते है पर उनके जैसे आदर्श नही रख पाते। फिल्म ये बैन भी हुई और इसका नाम भी बाद में बदला गया। तब मनोज साहब पर हिंदू धर्म की भावनाओ को आहत करने का आरोप भी लगा। मनोज कुमार में बाहर की फिल्मे बहुत कम की, कुछ चुनिंदा लोगो को छोड़कर और वो तकरीबन सभी हिट रही। पहचान, बेईमान, संन्यासी सोहन लाल कंवर के साथ की दस नंबरी मोहन सहगल के साथ, मनोज साहब की फिल्मों का संगीत शानदार रहता था, उनकी फिल्मांकन भी जबरदस्त हुआ करता था। मनोज साहब बेहद भावहीन चेहरे से अभिनय करते थे। उनके चाहने वाले आज भी उनको देशभक्त भारत कुमार ने नाम से पुकारते हैं। उनकी फिल्में बार बार देखना पसंद करते हैं। पंडित जी शतायु हों।

अरविंद कुमार श्रीवास्तव की रिपोर्ट आवाज इंडिया लाइव फिरोजाबाद

anupam

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