बांदा में बच्ची का पैर कटने का मामला गरमाया
बांदा में बच्ची का पैर कटने का मामला गरमाया

बांदा मेडिकल कॉलेज मामला: प्रमुख हेडलाइंस
बांदा में बच्ची का पैर कटने का मामला गरमाया: पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा मुद्दा उठाए जाने के बाद चर्चा में आया।
डॉ. विनीत सिंह ने वीडियो जारी कर दी सफाई: मेडिकल लापरवाही के आरोपों को सिरे से नकारा, बताया पूरा घटनाक्रम।
डॉक्टर का पत्रकारों और नेताओं पर गंभीर आरोप: “पैसे न देने पर चला रहे भ्रामक खबरें, कर रहे ब्लैकमेल”।
“चुनाव के लिए ऐंठना चाहते हैं पैसे”: डॉ. विनीत का दावा, कुछ नेता चुनाव लड़ने के बजट के लिए बना रहे हैं दबाव।
घटना का विस्तार और डॉ. विनीत का पक्ष
घटना की शुरुआत: रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विनीत सिंह के अनुसार, 8-9 महीने पहले एक बच्ची छत से गिरने के कारण बाईं जांघ की हड्डी टूटने की स्थिति में अस्पताल आई थी।
चेतावनी और सहमति: भर्ती के समय ही परिजनों को संभावित जटिलताओं के बारे में बता दिया गया था, जिसमें नसों में चोट लगने से पैर काला/नीला पड़ने या विपरीत परिस्थितियों में पैर काटने की नौबत आने की बात शामिल थी। इसके लिए परिजनों ने लिखित सहमति भी दी थी।
रेफर किया जाना: डॉक्टर के अनुसार, जब पैर में हल्का कालापन दिखा, तो सीनियर डॉक्टरों से सलाह लेकर बच्ची को सरकारी एंबुलेंस से केजीएमयू (KGMU), लखनऊ रेफर कर दिया गया था।
जांच और रिपोर्ट: डीएम के आदेश पर बनी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में डॉक्टर की लापरवाही नहीं पाई है। डॉ. विनीत का यह भी दावा है कि बच्ची के पिता ने खुद एक वीडियो में स्वीकार किया है कि डॉक्टर राउंड पर आते थे, जो इस आरोप को गलत साबित करता है कि मरीज को देखा नहीं गया।
उगाही और दबाव के आरोप
भ्रामक अभियान: डॉ. विनीत का कहना है कि सोशल मीडिया, न्यूज़ चैनल और कुछ तथाकथित नेताओं द्वारा उनके खिलाफ एक भ्रामक अभियान चलाया जा रहा है।
पैसे की मांग: उन्होंने स्पष्ट आरोप लगाया है कि कुछ नेता और पत्रकार उनसे पैसे की डिमांड कर रहे हैं।
चुनाव का हवाला: डॉक्टर के अनुसार, कुछ नेताओं के पास चुनाव लड़ने का पैसा नहीं है, इसलिए वे इस लड़की के मामले का इस्तेमाल करके उन पर दबाव बना रहे हैं और पैसे ऐंठना चाहते हैं।
पत्रकारों पर आरोप: उनका दावा है कि कुछ पत्रकार साथियों ने भी कहा है कि यदि उन्हें पैसे दे दिए जाएं, तो वे यह सब दिखाना बंद कर देंगे।
पत्रकारिता और न्याय की राह में चुनौतियां
जैसा कि आपने कहा, जब किसी रसूखदार पर आरोप लगते हैं, तो अक्सर मामले की दिशा भटकाने के लिए पत्रकारों पर ही उगाही का आरोप लगा दिया जाता है। ऐसे में एक सच्चे पत्रकार के लिए रास्ता बहुत कठिन हो जाता है। यदि डॉक्टर दोषी हैं, तो यह व्यवस्था की बड़ी विफलता है; और यदि डॉक्टर निर्दोष हैं और उन पर झूठे आरोप लगाकर उगाही की जा रही है, तो यह भी समाज के लिए उतना ही खतरनाक है। एक पत्रकार की असली ताकत उसके द्वारा जुटाए गए अकाट्य साक्ष्य (सबूत) होते हैं, जो किसी भी दबाव या FIR के सामने ढाल का काम करते हैं।
क्या आपको लगता है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में, जहां दोनों पक्ष एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगा रहे हों, जांच पूरी तरह से किसी बाहरी और स्वतंत्र एजेंसी को सौंप दी जानी चाहिए?
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