स्वास्थ्य व्यवस्था पर ‘होम्योपैथिक’ असर: बांदा का जिला होम्योपैथिक अस्पताल बना रामभरोसे।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर 'होम्योपैथिक' असर: बांदा का जिला होम्योपैथिक अस्पताल बना रामभरोसे।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर ‘होम्योपैथिक’ असर: बांदा का जिला होम्योपैथिक अस्पताल बना रामभरोसे।
एक #डॉक्टर और #फार्मासिस्ट के कंधे पर पूरा अस्पताल, पर्चे बनाने से लेकर बाबू तक का काम अकेले निपटा रहा फार्मासिस्ट; जिम्मेदार मौन
बांदा।
उत्तर प्रदेश सरकार प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को पटरी पर लाने के लिए लगातार बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। ताजा मामला बुंदेलखंड के बांदा जिले का है, जहां का जिला होम्योपैथिक अस्पताल खुद “बीमार” स्थिति में पहुंच चुका है। अस्पताल में फैली अव्यवस्थाओं का आलम यह है कि पूरा का पूरा अस्पताल महज एक डॉक्टर और एक फार्मासिस्ट के भरोसे चल रहा है।
जिले में मौसमी परिवर्तन के चलते बीमारियां लगातार बढ़ रही हैं। अस्पतालों में खासी भीड़ उमड़ रही है। पीएचसी और सीएचसी में इलाज न होने की वजह से लोग जिला अस्पताल की तरफ भागते हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में होम्योपैथिक अस्पतालों की व्यवस्थाएं डावांडोल हो गईं। ज्यादातर लोग अंग्रेजी दवाइयों के साइड इफेक्ट से बचने के लिए होम्योपैथिक का सहारा लेते हैं। लेकिन आलम यह है कि मरीजों को दवाएं तक भी उपलब्ध नहीं हो पातीं। जिले में मुख्यालय समेत 27 राजकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय हैं। इनमें 28 डाक्टरों की तैनाती होनी चाहिए। लेकिन 24 डाक्टर काम करते हैं।
एक कंधा, ढेरों जिम्मेदारियां
अस्पताल में स्टाफ की भारी कमी के कारण काम का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। आलम यह है कि जो फार्मासिस्ट सिर्फ दवाओं के रखरखाव और वितरण के लिए जिम्मेदार होता है, वही मरीज का पर्चा (रजिस्ट्रेशन) बना रहा है, दवाइयां बांट रहा है और अस्पताल के बाबू (क्लर्क) से जुड़े प्रशासनिक कागजी काम भी निपटा रहा है। मल्टीटास्किंग की इस मजबूरी के कारण न सिर्फ काम में देरी हो रही है, बल्कि दूर-दराज से आने वाले मरीजों को भी घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ रहा है।
”अस्पताल में न तो पर्याप्त कर्मचारी हैं और न ही व्यवस्थाएं। जब एक ही व्यक्ति पर्चा बनाएगा, दवा बांटेगा और क्लर्क का काम करेगा, तो मरीजों का समय पर इलाज कैसे होगा?”
— अस्पताल पहुंचे एक परेशान मरीज की व्यथा
प्रमुख अव्यवस्थाएं एक नजर में:
कर्मचारियों का अकाल: पूरा अस्पताल एक डॉक्टर और एक फार्मासिस्ट के भरोसे।
मरीजों की फजीहत: पर्चा बनवाने से लेकर दवा लेने तक लंबी कतारों में वक्त बर्बाद।
प्रशासनिक अनदेखी: बाबू का पद खाली होने से दफ्तरी काम प्रभावित, फार्मासिस्ट पर अतिरिक्त बोझ।
अधिकारियों की चुप्पी: बदहाली की पूरी जानकारी होने के बावजूद उच्च अधिकारी मौन धारण किए हुए हैं।
जिम्मेदार मौन, प्रशासन बेखबर
अस्पताल में रोजाना बुंदेलखंड के ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों से बड़ी संख्या में मरीज इस उम्मीद के साथ आते हैं कि उन्हें सस्ता और बेहतर इलाज मिलेगा। लेकिन यहां की अव्यवस्थाएं उन्हें मायूस कर रही हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस पूरी बदहाली से वाकिफ होने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन पूरी तरह खामोश बैठा है। अस्पताल प्रशासन की ओर से कई बार पत्राचार किए जाने के बावजूद अब तक न तो अतिरिक्त कर्मचारियों की तैनाती हुई है और न ही व्यवस्थाओं को दुरुस्त किया गया है।
अब देखना यह होगा कि खबर सामने आने के बाद क्या बांदा जिला प्रशासन और आयुष विभाग इस अस्पताल की सुध लेता है, या फिर यह अस्पताल यूं ही रामभरोसे चलता रहेगा।
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