April 22, 2021

फिरोजाबाद : *_प्राकृतिक आहार में अनियमित संयोग कही बन न जाये जीवन संकट का योग आहार लें मगर सावधानी से_*

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फिरोजाबाद

पंडित श्याम शर्मा मंडल प्रभारी

स्वस्थ और सबल भारत
*डॉ राव पी सिंह*

विरुद्ध आहार

आयुर्वेद के अनुसार प्रकृति विरुद्ध आहार बहुत सी बिमारियों का कारण है ..

1 दूध और कटहल का कभी भी एक साथ सेवन नहीं करना चाहिये ।

2. दूध और कुलत्थी भी कभी एक साथ नहीं लेना चाहिए।

3. नमक और दूध (सेंधा नमक छोड़कर) दूध और सभी प्रकार की खटाइयां, दूध और मूँगफली, दूध और मछली, एक साथ प्रयोग ना करें।

4. दही गर्म करके नहीं खाना चाहिये हानि पहुँचती है, कढ़ी बनाकर खा सकते हैं।

5. शहद और घी समान परिणाम में मिलाकर लेना विष के समान है।

6. जौ का आटा कोई अन्न मिलाये बिना नहीं लेना चाहिए।

7. रात्रि के समय सत्तू का प्रयोग वर्जित है, बिना जल मिलाये सत्तू ना खायें।

8. तेज धूप में चलकर आने के बाद थोड़ा आराम करके ही पानी पियें, व्यायाम या शारीरिक परिश्रम के तुरन्त बाद पानी ना पियें या थोड़ी देर बाद पानी पियें और भोजन के प्रारम्भ में पानी पीना वर्जित है।

9. प्रात:काल भोजन के पश्चात तेज गति से चलना हानिकारक है।

10. शाम को खाने के बाद थोड़ी देर चलना आवश्यक है, खाना खाकर तुरन्त सो जाना हानिकारक है।

11. रात्रि में दही का सेवन निषेध है, भोजन के तुरन्त बाद जल का सेवन निषेध है। दिन में भोजन के बाद मठ्ठा और रात्रि में भोजन के बाद दूध लेना लाभदायक होता है। वात के रोगों में ब्लड एसिडिटी, कफ वृद्धि या संधिवात में दही ना खायें।

12. शौच क्रिया के बाद, भोजन से पहले, सर्दी-जुकाम होने पर, दांतों में पीव आने पर और पसीना आने की दशा में पान का सेवन नहीं करना चाहिए।

13 शहद कभी भी गर्म करके ना खायें, छोटी मधुमक्खी का शहद सर्वोत्तम होता है।

14 *दूध के साथ क्या आहार लें क्या ना ले और ले तो मात्रा या समय क्या हो*

दूध के साथ मूँग, उड़द, चना आदि सभी दालें, सभी प्रकार के खट्टे व मीठे फल, गाजर, शककंद, आलू, मूली जैसे कंदमूल, तेल, गुड़, शहद, दही, नारियल, लहसुन, कमलनाल, सभी नमकयुक्त व अम्लीय प्रदार्थ संयोगविरुध हैं | दूध व इनका सेवन एक साथ नहीं करना चाहिए | इनके बीच कम-से-कम २ घंटे का अंतर अवश्य रखें |

*दूध के साथ दही लें या नहीं?*
दूध और दही दोनों की तासीर अलग होती है। दही एक खमीर वाली चीज है। दोनों को मिक्स करने से बिना खमीर वाला खाना (दूध) खराब हो जाता है। साथ ही, एसिडिटी बढ़ती है और गैस, अपच व उलटी हो सकती है।

इसी तरह दूध के साथ अगर संतरे का जूस लेंगे तो भी पेट में खमीर बनेगा। अगर दोनों को खाना ही है तो दोनों के बीच घंटे-डेढ़ घंटे का फर्क होना चाहिए

दूध को विकृत कर बनाया गया छेना, पनीर आदि व खमीरीकृत प्रदार्थ (जैसे-डोसा, इडली, खमण) स्वभाव से ही विरुद्ध हैं अर्थात इनके सेवन से लाभ की जगह हानि ही होती है |

15 *दही या घी के साथ क्या आहार सही है और क्या निषिद्ध*

ऐसे ही दही के साथ उड़द, गुड़, काली मिर्च, केला व शहद; शहद के साथ गुड़; घी के साथ तेल नहीं खाना चाहिए |

शहद, घी, तेल व पानी इन चार द्रव्यों में से दो अथवा तीन द्रव्यों को समभाग मिलाकर खाना हानिकारक हैं |

गर्म व ठंडे पदार्थों को एक साथ खाने से जठराग्नि व पाचनक्रिया मंद हो जाती है |
दही व शहद को गर्म करने से वे विकृत बन जाते हैं |

*उत्तम स्वास्थ्य के लिए अवश्य ध्यान दे*

रासायनिक खाद व इंजेकशन द्वारा उगाये गये आनाज व सब्जियाँ तथा रसायनों द्वारा पकाये गये फल भी स्वभावविरुद्ध हैं |

हेमंत व शिशिर इन शीत ऋतुओं में ठंडे, रुखे-सूखे, वातवर्धक पदार्थों का सेवन, अल्प आहार तथा वसंत-ग्रीष्म-शरद इन ऊष्ण ऋतुओं में ऊष्ण पदार्थं व दही का सेवन कालविरुद्ध है |

– मरुभूमि में रुक्ष, उषण, तीक्षण पदार्थों (अधिक मिर्च, गर्म मसाले आदि) व समुद्रतटीय प्रदेशों में चिकने-ठंडे पदार्थों का सेवन, क्षारयुक्त भूमि के जल का सेवन देशविरुद्ध है |

– अधिक परिश्रम करनेवाले व्यक्तियों के लिए रुखे-सूखे, वातवर्धक पदार्थ व कम भोजन तथा बैठे-बैठे काम करनेवाले व्यक्तियों के लिए चिकने, मीठे, कफवर्धक पदार्थ व अधिक भोजन अवस्थाविरुद्ध है

अधकच्चा, अधिक पका हुआ, जला हुआ, बार-बार गर्म किया गया, उच्च तापमान पर पकाया गया (जैसे-ओवन में बना व फास्टफूड), अति शीत तापमान में रखा गया (जैसे-फिर्ज में रखे पदार्थ) भोजन पाकविरुद्ध है |

मल, मूत्र का त्याग किये बिना, भूख के बिना अथवा बहुत अधिक भूख लगने पर भोजन करना क्रमविरुद्ध है |

जो आहार मनोनुकूल न हो वह ह्रदयविरुद्ध है क्योंकि अग्नि प्रदीप्त होने पर भी आहार मनोनुकूल न हो तो सम्यक पाचन नहीं होता |

नासमझी के कारण कुछ लोग दूध में सोडा या कोल्डड्रिंक डालकर पीते हैं | यह स्वाद की गुलामी आगे चलकर उन्हें कितनी भारी पड़ती है,उन्हें पता नहीं |

खीर के साथ नमकवाला भोजन, खिचड़ी के साथ आइसक्रीम, मिल्कशेक – ये सब विरुद्ध आहार हैं |

खट्टे-खारे के साथ भूलकर भी दूध की चीज न खायें- न खिलायें |

*वो सवाल जो जेहन में बार बार उठते है*
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*दूध के साथ तला-भुना और नमकीन खाएं या नहीं?*
दूध में मिनरल और विटामिंस के अलावा लैक्टोस शुगर और प्रोटीन होते हैं। दूध एक एनिमल प्रोटीन है और उसके साथ ज्यादा मिक्सिंग करेंगे तो रिएक्शन हो सकते हैं। फिर नमक मिलने से मिल्क प्रोटींस जम जाते हैं और पोषण कम हो जाता है। अगर लंबे समय तक ऐसा किया जाए तो स्किन की बीमारियां हो सकती हैं।

*सोने से पहले दूध पीना चाहिए या नहीं?*
आयुर्वेद के मुताबिक नींद शरीर के कफ दोष से प्रभावित होती है। दूध अपने भारीपन, मिठास और ठंडे मिजाज के कारण कफ प्रवृत्ति को बढ़ाकर नींद लाने में सहायक होता है। मॉडर्न साइंस में भी माना जाता है कि दूध नींद लाने में मददगार होता है। इससे सेरोटोनिन हॉर्मोन भी निकलता है, जो दिमाग को शांत करने में मदद करता है। वैसे, दूध अपने आप में पूरा आहार है, जिसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और कैल्शियम होते हैं। इसे अकेले पीना ही बेहतर है। साथ में बिस्किट, रस्क, बादाम या ब्रेड ले सकते हैं, लेकिन भारी खाना खाने से दूध के गुण शरीर में समा नहीं पाते।

दूध में पत्ती या अदरक आदि मिलाने से सिर्फ स्वाद बढ़ता है, उसका मिजाज नहीं बदलता। वैसे, टोंड दूध को उबालकर पीना, खीर बनाकर या दलिया में मिलाकर लेना और भी फायदेमंद है। बहुत ठंडे या गर्म दूध की बजाय गुनगुना या कमरे के तापमान के बराबर दूध पीना बेहतर है।

नोट : अक्सर लोग मानते हैं कि सर्जरी या टांके आदि के बाद दूध नहीं लेना चाहिए क्योंकि इससे पस पड़ सकती है, यह गलतफहमी है। दूध में मौजूद प्रोटीन शरीर की टूट-फूट को जल्दी भरने में मदद करते हैं। दूध दिन भर में कभी भी ले सकते हैं। सोने से कम-से-कम एक घंटे पहले लें। दूध और डिनर में भी एक घंटे का अंतर रखें।

*खाने के साथ छाछ लें या नहीं?*
छाछ बेहतरीन ड्रिंक या ऐडिशनल डाइट है। खाने के साथ इसे लेने से खाने का पाचन भी अच्छा होता है और शरीर को पोषण भी ज्यादा मिलता है। यह खुद भी आसानी से पच जाती है। इसमें अगर एक चुटकी काली मिर्च, जीरा और सेंधा नमक मिला लिया जाए तो और अच्छा है। इसमें अच्छे बैक्टीरिया भी होते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं। मीठी लस्सी पीने से फालतू कैलरी मिलती हैं, इसलिए उससे बचना चाहिए।

*दही और फल एक साथ लें या नहीं?*
फलों में अलग एंजाइम होते हैं और दही में अलग। इस कारण वे पच नहीं पाते, इसलिए दोनों को साथ लेने की सलाह नहीं दी जाती। फ्रूट रायता कभी-कभार ले सकते हैं, लेकिन बार-बार इसे खाने से बचना चाहिए।

*दूध के साथ फल खाने चाहिए या नहीं?*
दूध के साथ फल लेते हैं तो दूध के अंदर का कैल्शियम फलों के कई एंजाइम्स को एड्जॉर्ब (खुद में समेट लेता है और उनका पोषण शरीर को नहीं मिल पाता) कर लेता है। संतरा और अनन्नास जैसे खट्टे फल तो दूध के साथ बिल्कुल नहीं लेने चाहिए। व्रत वगैरह में बहुत से लोग केला और दूध साथ लेते हैं, जोकि सही नहीं है। केला कफ बढ़ाता है और दूध भी कफ बढ़ाता है। दोनों को साथ खाने से कफ बढ़ता है और पाचन पर भी असर पड़ता है। इसी तरह चाय, कॉफी या कोल्ड ड्रिंक के रूप में खाने के साथ अगर बहुत सारा कैफीन लिया जाए तो भी शरीर को पूरे पोषक तत्व नहीं मिल पाते।

*मछली के साथ दूध पिएं या नहीं?*
दही की तासीर ठंडी है। उसे किसी भी गर्म चीज के साथ नहीं लेना चाहिए। मछली की तासीर काफी गर्म होती है, इसलिए उसे दही के साथ नहीं खाना चाहिए। इससे गैस, एलर्जी और स्किन की बीमारी हो सकती है। दही के अलावा शहद को भी गर्म चीजों के साथ नहीं खाना चाहिए।

*फल खाने के फौरन बाद पानी पी सकते हैं, खासकर तरबूज खाने के बाद?*
फल खाने के फौरन बाद पानी पी सकते हैं, हालांकि दूसरे तरल पदार्थों से बचना चाहिए। असल में फलों में काफी फाइबर होता है और कैलरी काफी कम होती है। अगर ज्यादा फाइबर के साथ अच्छा मॉइश्चर यानी पानी भी मिल जाए तो शरीर में सफाई अच्छी तरह हो जाती है। लेकिन तरबूज या खरबूज के मामले में यह थ्योरी सही नहीं बैठती क्योंकि ये काफी फाइबर वाले फल हैं। तरबूज को अकेले और खाली पेट खाना ही बेहतर है। इसमें पानी काफी ज्यादा होता है, जो पाचन रसों को डाइल्यूट कर देता है। अगर कोई और चीज इसके साथ या फौरन बाद/पहले खाई जाए तो उसे पचाना मुश्किल होता है। इसी तरह, तरबूज के साथ पानी पीने से लूज-मोशन हो सकते हैं। वैसे तरबूज अपने आप में काफी अच्छा फल है। यह वजन घटाने के इच्छुक लोगों के अलावा शुगर और दिल के मरीजों के लिए भी अच्छा है।

*खाने के साथ फल नहीं खाने चाहिए।*
नीबू, संतरा, अनन्नास आदि खट्टे फल एसिडिक होते हैं। दोनों को साथ खाया जाए तो कार्बोहाइड्रेट या स्टार्च की पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है। इससे कब्ज, डायरिया या अपच हो सकती है। वैसे भी फलों के पाचन में सिर्फ दो घंटे लगते हैं, जबकि खाने को पचने में चार-पांच घंटे लगते हैं।

*मीठे फल और खट्टे फल एक साथ न खाएं*
आयुर्वेद के मुताबिक, संतरा और केला एक साथ नहीं खाना चाहिए क्योंकि खट्टे फल मीठे फलों से निकलनेवाली शुगर में रुकावट पैदा करते हैं, जिससे पाचन में दिक्कत हो सकती है। साथ ही, फलों की पौष्टिकता भी कम हो सकती है।

*खाने के साथ पानी पिएं या नहीं?*
पानी बेहतरीन पेय है, लेकिन खाने के साथ पानी पीने से बचना चाहिए। अगर पीना ही है तो थोड़ा पिएं और गुनगुना या नॉर्मल पानी पिएं। बहुत ठंडा पानी पीने से बचना चाहिए। पानी में अजवाइन या जीरा डालकर उबाल लें। यह खाना पचाने में मदद करता है। खाने से आधा घंटा पहले या एक घंटा बाद गिलास भर पानी पीना अच्छा है।

*परांठे के साथ दही खाएं या नहीं?*
आयुर्वेद के मुताबिक परांठे या पूरी आदि तली-भुनी चीजों के साथ दही नहीं खाना चाहिए क्योंकि दही फैट के पाचन में रुकावट पैदा करता है। इससे फैट्स से मिलनेवाली एनजीर् शरीर को नहीं मिल पाती। दही खाना ही है तो उसमें काली मिर्च, सेंधा नमक या आंवला पाउडर मिला लें। हालांकि रोटी के साथ दही खाने में कोई परहेज नहीं है। मॉडर्न साइंस कहता है कि दही में गुड बैक्टीरिया होते हैं, जोकि खाना पचाने में मदद करते हैं इसलिए दही जरूर खाना चाहिए।

*फैट और प्रोटीन एक साथ खाएं या नहीं?*
घी, मक्खन, तेल आदि फैट्स को पनीर, अंडा, मीट जैसे भारी प्रोटींस के साथ ज्यादा नहीं खाना चाहिए क्योंकि दो तरह के खाने अगर एक साथ खाए जाएं, तो वे एक-दूसरे की पाचन प्रक्रिया में दखल देते हैं। इससे पेट में दर्द या पाचन में गड़बड़ी हो सकती है।

*दूध, ब्रेड और बटर एक साथ लें या नहीं?*
दूध को अकेले लेना ही बेहतर है। तब शरीर को इसका फायदा ज्यादा होता है। आयुर्वेद के मुताबिक प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और फैट की ज्यादा मात्रा एक साथ नहीं लेनी चाहिए क्योंकि तीनों एक-दूसरे के पचने में रुकावट पैदा कर सकते हैं और पेट में भारीपन हो सकता है।

*तरह-तरह की डिश एक साथ खाएं या नहीं?*
एक बार के खाने में बहुत ज्यादा वैरायटी नहीं होनी चाहिए। एक ही थाली में सब्जी, नॉन-वेज, मीठा, चावल, अचार आदि सभी कुछ खा लेने से पेट में खलबली मचती है। रोज के लिए फुल वैरायटी की थाली वाला कॉन्सेप्ट अच्छा नहीं है। कभी-कभार ऐसा चल जाता है।

*खाने के बाद मीठा खाएं या नहीं?*
मीठा अगर खाने से पहले खाया जाए तो बेहतर है क्योंकि तब न सिर्फ यह आसानी से पचता है, बल्कि शरीर को फायदा भी ज्यादा होता है। खाने के बाद में मीठा खाने से प्रोटीन और फैट का पाचन मंदा होता है। शरीर में शुगर सबसे पहले पचता है, प्रोटीन उसके बाद और फैट सबसे बाद में।

*खाने के बाद चाय पिएं या नहीं?*
खाने के बाद चाय पीने से कई फायदा नहीं है। यह गलत धारणा है कि खाने के बाद चाय पीने से पाचन बढ़ता है। हालांकि ग्रीन टी, डाइजेस्टिव टी, कहवा या सौंफ, दालचीनी, अदरक आदि की बिना दूध की चाय पी सकते हैं।

*छोले-भठूरे या पिज्जा/बर्गर के साथ कोल्ड ड्रिंक्स लें या नहीं?*
कोल्ड ड्रिंक में मौजूद एसिड की मात्रा और ज्यादा शुगर फास्ट फूड (पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राइस आदि) में मौजूद फैट के साथ अच्छा नहीं माना जाता। तला-भुना खाना एसिडिक होता है और शुगर भी एसिडिक होती है। ऐसे में दोनों को एक साथ लेना सही नहीं है। साथ ही बहुत गर्म और ठंडा एक साथ नहीं खाना चाहिए। गर्मागर्म भठूरे या बर्गर के साथ ठंडा कोल्ड ड्रिंक पीना शरीर के तापमान को खराब करता है। स्नैक्स में मौजूद फैटी एसिड्स शुगर का पाचन भी खराब करते हैं। फास्ट फूड या तली-भुनी चीजों के साथ कोल्ड ड्रिंक के बजाय जूस, नीबू-पानी या छाछ ले सकते हैं। जूस में मौजूद विटामिन-सी खाने को पचाने में मदद करता है।

*भारी काबोर्हाइड्रेट्स के साथ भारी प्रोटीन खाएं या नहीं?*
मीट, अंडे, पनीर, नट्स जैसे प्रोटीन ब्रेड, दाल, आलू जैसे भारी कार्बोहाइड्रेट्स के साथ न खाएं। दरअसल, हाई प्रोटीन को पचाने के लिए जो एंजाइम चाहिए, अगर वे एक्टिवेट होते हैं तो वे हाई कार्बो को पचाने वाले एंजाइम को रोक देते हैं। ऐसे में दोनों का पाचन एक साथ नहीं हो पाता। अगर लगातार इन्हें साथ खाएं तो कब्ज की शिकायत हो सकती है।

*अगर कोई ऐसी बिमारी है जो वर्षों से ठीक नहीं हो रही तो खाने में ये आजमा कर देखे*

*ये जरूर ध्यान रखे*
सूप बनाते समय उसमे दूध नहीं डाले .
दही खट्टा हो तो उसमे दूध नहीं डाले .
ओट्स पकाते समय उसमे दूध दही साथ साथ न डाले .
चाय कॉफ़ी में शहद ना डाले .
पूरी , भटूरे , मिठाइयां डालडा घी में ना बना कर शुद्ध घी में बनाए .
नमकीन चावलों में , सब्जी की करी में दूध न डाले .
खट्टे फलों के साथ , फ्रूट सलाद में क्रीम या दूध न डाले .
दही बड़ा विरुद्ध आहार है .
4 बजे के बाद केले , दही , शरबत , आइसक्रीम आदि का सेवन ना करे .
आटा गूंधने के लिए दूध का इस्तेमाल ना करे .
गर्मियों में हरी मिर्च और सर्दियों में लाल मिर्च का सेवन करे .
सुबह ठंडी तासीर की और शाम के बाद गर्म तासीर के खाने का सेवन करे .
पकौड़ों के साथ चाय या मिल्क शेक नहीं गरम कढ़ी ले .
फलों को सुबह नाश्ते के पहले खाए . किसी अन्य खाने के साथ मिलाकर ना ले .कच्चा सलाद भी खाने के पहले खा ले .
दही रायते को हिंग जीरे का तडका अवश्य लगाएं .
दाल में एक चम्मच घी अवश्य डाले .
खाली पेट पान का सेवन ना करे .
खाने के साथ पानी नहीं ज़्यादा पानी डाला छाछ या ज्यूस या सूप पियें .
अत्याधिक नमक और खट्टे पदार्थ सेहत के लिए ठीक नहीं .
बघार लगाने में खूब हिंग , जीरा , सौंफ , मेथीदाना , धनिया पावडर , अजवाइन आदि का प्रयोग करें .

*विधि विरुद्ध आहार मृत्यु कारक हो सकता है*
विरोधी आहार के सेवन से बल, बुद्धि, वीर्य व आयु का नाश, नपुंसकता, अंधत्व, पागलपन, भगंदर, त्वचाविकार, पेट के रोग, सूजन, बवासीर, अम्लपित्त (एसीडिटी), सफेद दाग, ज्ञानेन्द्रियों में विकृति व अष्टौमहागद अर्थात् आठ प्रकार की असाध्य व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। विरुद्ध अन्न का सेवन मृत्यु का भी कारण हो सकता है।

*दैन्यकर्म में ये उपाय अवश्य अपनाए*

1. तेज ज्वर आने पर तेज हवा, दिन में अधिक देर तक सोना, अधिक परिश्रम, स्नान, क्रोध आदि से बचना चाहिये।

2. नींद लेने से पित्त घटता है, मालिश से वात कम होता है और उल्टी करने से कफ कम होता है एवं उपवास करने से ज्वर शांत होता है।

3. सिर पर अधिक गर्म पानी डालकर स्नान करने से नेत्रों की ज्योति कम होती है जरूरत पड़ने पर गुनगुने पानी से स्नान कर सकते हैं।

4. सोते समय सिर पर कपड़ा बांधकर सोना, पैरों में मोजे पहनकर सोना, अधिक चुस्त कपड़े पहनकर सोना हानिकारक है।

वंदे मातरम 🇮🇳
स्वस्थ और सबल भारत

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🍃 *_डॉ राव पी सिंह dnys_*🍃
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*संपर्क सूत्र 9672499053*
[07/04, 6:49 PM] Savitanandmishra: कैलाश पर्वत और चंद्रमा का रहस्य

कैलाश पर्वत एक अनसुलझा रहस्य, कैलाश पर्वत के इन रहस्यों से नासा भी हो चुका है चकित

कैलाश पर्वत, इस एतिहासिक पर्वत को आज तक हम सनातनी भारतीय लोग शिव का निवास स्थान मानते हैं। शास्त्रों में भी यही लिखा है कि कैलाश पर शिव का वास है।

किन्तु वहीं नासा जैसी वैज्ञानिक संस्था के लिए कैलाश एक रहस्यमयी जगह है। नासा के साथ-साथ कई रूसी वैज्ञानिकों ने कैलाश पर्वत पर अपनी रिपोर्ट दी है।

उन सभी का मानना है कि कैलाश वास्तव में कई अलौकिक शक्तियों का केंद्र है। विज्ञान यह दावा तो नहीं करता है कि यहाँ शिव देखे गये हैं किन्तु यह सभी मानते हैं कि, यहाँ पर कई पवित्र शक्तियां जरूर काम कर रही हैं। तो आइये आज हम आपको कैलाश पर्वत से जुड़े हुए कुछ रहस्य बताते हैं।

कैलाश_पर्वत_के_रहस्य.

रहस्य 1– रूस के वैज्ञानिको का ऐसा मानना है कि, कैलाश पर्वत आकाश और धरती के साथ इस तरह से केंद्र में है जहाँ पर चारों दिशाएँ मिल रही हैं। वहीं रूसी विज्ञान का दावा है कि यह स्थान एक्सिस मुंडी है और इसी स्थान पर व्यक्ति अलौकिक शक्तियों से आसानी से संपर्क कर सकता है। धरती पर यह स्थान सबसे अधिक शक्तिशाली स्थान है।

रहस्य 2 – दावा किया जाता है कि आज तक कोई भी व्यक्ति कैलाश पर्वत के शिखर पर नहीं पहुच पाया है। वहीं 11 सदी में तिब्बत के योगी मिलारेपी के यहाँ जाने का दावा किया जाता रहा है। किन्तु इस योगी के पास इस बात के प्रमाण नहीं थे या फिर वह स्वयं प्रमाण प्रस्तुत नहीं करना चाहता था। इसलिए यह भी एक रहस्य है कि इन्होंने यहाँ कदम रखा या फिर वह कुछ बताना नहीं चाहते थे।

रहस्य 3 – कैलाश पर्वत पर दो झीलें हैं और यह दोनों ही रहस्य बनी हुई हैं। आज तक इनका भी रहस्य कोई खोज नहीं पाया है। एक झील साफ़ और पवित्र जल की है। इसका आकार सूर्य के समान बताया गया है। वहीं दूसरी झील अपवित्र और गंदे जल की है तो इसका आकार चन्द्रमा के समान है।

रहस्य 4 – यहाँ के आध्यात्मिक और शास्त्रों के अनुसार रहस्य की बात करें तो कैलाश पर्वत पे कोई भी व्यक्ति शरीर के साथ उच्चतम शिखर पर नहीं पहुच सकता है। ऐसा बताया गया है कि, यहाँ पर देवताओं का आज भी निवास हैं। पवित्र संतों की आत्माओं को ही यहाँ निवास करने का अधिकार दिया गया है।

रहस्य 5 – कैलाश पर्वत का एक रहस्य यह भी बताया जाता है कि जब कैलाश पर बर्फ पिघलती है तो यहाँ से डमरू जैसी आवाज आती है। इसे कई लोगों ने सुना है। लेकिन इस रहस्य को आज तक कोई हल नहीं कर पाया है.

रहस्य 6 – कई बार कैलाश पर्वत पर *सात तरह के प्रकाश* आसमान मेंदेखे गये हैं। इस पर नासा का ऐसा मानना है कि यहाँ चुम्बकीय बल है और आसमान से मिलकर वह कई बार इस तरह की चीजों का निर्माण करता

रहस्य 7 – कैलाश पर्वत दुनिया के 4 मुख्य धर्मों का केंद्र माना गया है। यहाँ कई साधू और संत अपने देवों से टेलीपैथी से संपर्क करते हैं। असल में यह आध्यात्मिक संपर्क होता है।

रहस्य 8 – कैलाश पर्वत का सबसे बड़ा रहस्य खुद विज्ञान ने साबित किया है कि यहाँ पर प्रकाश और ध्वनि के बीच इस तरह का समागम होता है कि यहाँ से *ॐ* की आवाजें सुनाई देती हैं।

समझ गये होंगे कि, कैलाश पर्वत क्यों आज भी इतना धार्मिक और वैज्ञानिक महत्त्व रखे हुए है। हर साल यहाँ दुनियाभर से कई लोग अनुभव लेने आते हैं, और सनातन धर्म के लिए कैलाश सबसे बड़ा आदिकालीन धार्मिक स्थल भी बना हुआ

चंद्रमा_का_रहस्य ……

धरती के एक ओर उत्तरी ध्रुव है, तो दूसरी ओर दक्षिणी ध्रुव। दोनों के बीचोबीच स्थित है हिमालय। हिमालय का केंद्र है कैलाश पर्वत। वैज्ञानिकों के अनुसार यह धरती का केंद्र है। यह एक ऐसा भी केंद्र है जिसे एक्सिस मुंडी (Axis Mundi) कहा जाता है। एक्सिस मुंडी अर्थात दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव का केंद्र। यह आकाश और पृथ्वी के बीच संबंध का एक बिंदु है, जहां दसों दिशाएं मिल जाती हैं। जब कैलाश शिखर पर सूर्य की किरणें पड़ती है तो यह अद्भुत रूप से स्वर्ण के समान चमकने लगता है और जब चंद्र की किरणें पड़ती है तो यह पर्वत पूर्णत: चांदी जैसा दिखाई देने लगता
कैलाश की दूसरी झील (राक्षस झील) अपवित्र और गंदे जल की है तो इसका आकार चन्द्रमा के समान है।

यहाँ पर सूर्य और चंद्रमा के संधि काल (सायं काल) प्रकाश और ध्वनि के बीच इस तरह का समागम होता है कि यहाँ से *ॐ* की आवाजें सुनाई देती हैं।

– डॉ0 विजय शंकर मिश्र
[07/04, 6:49 PM] Savitanandmishra: चैत्र नवरात्रि में फलदायक है रामचरित मानस के दोहे
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नवरात्रि में देवी के विभिन्न रूपों की अर्चना
की जाकर इच्छापूर्ति हेतु मंत्र प्रयोग किए जाते हैं।
जो सर्वसाधारण के लिए थोड़े क्लिष्ट पड़ते हैं। रामचरित मानस के
दोहे, चौपाई और सोरठा अथवा उनके मंत्रों से इच्छापूर्ति
की जाती है, जो अपेक्षाकृत सरल है।
रामचरितमानस के निम्नलिखित प्रयोग किए जा सकते हैं:-
(1) मनोकामना पूर्ति एवं सर्वबाधा निवारण हेतु-
‘कवन सो काज कठिन जग माही।
जो नहीं होइ तात तुम पाहीं।।’
(2) भय व संशय निवृत्ति के लिए-
‘रामकथा सुन्दर कर तारी।
संशय बिहग उड़व निहारी।।’
(3) अनजान स्थान पर भय के लिए मंत्र पढ़कर रक्षारेखा
खींचे-
‘मामभिरक्षय रघुकुल नायक।
धृतवर चाप रुचिर कर सायक।।’
(4) भगवान राम की शरण प्राप्ति हेतु-
‘सुनि प्रभु वचन हरष हनुमाना।
सरनागत बच्छल भगवाना।।’
(5) विपत्ति नाश के लिए-
‘राजीव नयन धरें धनु सायक।
भगत बिपति भंजन सुखदायक।।’
(6) रोग तथा उपद्रवों की शांति हेतु-
‘दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहिं ब्यापा।।
(7) आजीविका प्राप्ति या वृद्धि हेतु-
‘बिस्व भरन पोषन कर जोई।
ताकर नाम भरत अस होई।।’
(8) विद्या प्राप्ति के लिए-
‘गुरु गृह गए पढ़न रघुराई।
अल्पकाल विद्या सब आई।।’
(9) संपत्ति प्राप्ति के लिए-
‘जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं।
सुख संपत्ति नानाविधि पावहिं।।’
(10) शत्रु नाश के लिए-
‘बयरू न कर काहू सन कोई।
रामप्रताप विषमता खोई।।’
आवश्यकता के अनुरूप कोई मंत्र लेकर एक माला जपें तथा एक माला
का हवन करें। जप के पहले श्री हनुमान
चालीसा का पाठ कर लें तो शुभ रहेगा। जब तक कार्य
पूरा न हो, तब तक एक माला (तुलसी की)
नित्य जपें। यदि सम्पुट में इनका प्रयोग करें तो शीघ्र
तथा निश्चित कार्यसिद्धि होगी। नवरात्रि में एक दिन
सुंदरकांड अवश्य करें।

– डॉ0 विजय शंकर मिश्र
[07/04, 6:49 PM] Savitanandmishra: संत वाणी मृत्यु के समय क्या करे ?
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मृत्यु के समय सबसे बड़ी सेवा है – किसी भी उपाय से मरणासन्न रोगी का मन संसार से हटा कर भगवान् में लगा देना | इसके लिए :-

१.👉 उसके पास बैठ कर घर की, संसार की, कारोबार की, किन्ही में राग द्वेष हो तोह उनकी ममता के पदार्थो की तथा अपने दुःख की चर्चा बिलकुल न करे |

२.👉 जब तक चेत रहे, भगवान् के स्वरुप की, लीला की तथा उनके तत्त्व के बात सुनाये, श्रीमद्भगवत गीता का {सातवे,नवे, बारहवे, चौदहवे, पन्द्रहवे अध्याय का विशेष रूप से} अर्थ सुनावे | भागवत के एकादश स्कंध,योगवाशिष्ट का वैराग्य प्रकरण, उपनिषदों के चुने हुए स्थलों का अर्थ सुनावे |

नाम कीर्तन में रूचि हो तोह नाम कीर्तन करे या संतो भक्तों के पद सुनाये |

जगत के प्राणी पदार्थो की , राग द्वेष उत्पन्न करने वाली बात, ममता मोह को जगाने वाली बात तथा बढ़ाने वाली चर्चा भूल कर भी न करे |

३.👉 रोगी को भगवान् के साकार रूप का प्रेमी हो तोह उसको अपने इष्ट – भगवान् राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा, गणेश- किसी भी भगवत रूप का मनोहर चित्र सतत दिखाते रहे | निराकार निर्गुण का उपासक हो तोह उसे आत्मा या ब्रह्म के सच्चिदानंद अद्वेत तत्व के चर्चा सुनाये |

४👉 उस स्थान को पवित्र धूप धुए ,कपूर से सुगन्धित रखे , कपूर या घी के दीपक के शीतल परमोज्व्ल ज्योति उसे दिखावे |

५.👉 समर्थ हो और रूचि हो तोह उसके द्वारा उसके ईस्ट भगवत्स्वरूप की मूर्ती का पूजन करवावे |

६.👉 कोई भी अपवित्र वास्तु या दवा उसे न दे | चिकित्सको की राय हो तो भी उसे ब्रांडी (शराब) नशीली तथा जान्तव पदार्थो से बनी ऐलोपथी , होम्योपैथी दअवा बिलकुल न दे | जिन आयुर्वेदिक दवा में अपिवित्र तथा जान्तव चीजे पड़ी हो , उनको भी न दे | ने खान पान में अपवित्र तामसी तथा जान्तव पदार्थ दे |

७.👉 रोगी के क्षमता के अनुसार गंगाजल का अधिक से अधिक या कम पान करावे | उसमे तुलसी के पते अलग पीस कर छानकर मिला दे | यो तुलसी मिश्रित गंगाजल पिलाता रहे |

८👉 गले में रूचि के अनुसार तुलसी या रूद्राक्ष के माला पहना दे | मस्तक पर रूचि के अनुसार त्रिपुंड या उधृरपुंड तिलक का पवित्र चन्दन से – -गोपीचंदन आदि से कर दे | अपवित्र केसर का तिलक न करे |

९👉 रोगी के निकट राम रक्षा या मृत्युंजय स्रोत्र का पाठ करे | एकदम अंतिम समय में पवित्र ‘नारायण’ नाम की विपुल ध्वनि करे |

१०.👉 रोगी को कस्ट का अनुभव न होता दीखे तोह गंगाजल या शुद्ध जल से उसे स्नान करा दे | कष्ट होता हो तोह न करावे |

११.👉 विशेष कस्ट न हो ताहो जमीं को धोकर उस पर गंगाजल ( हो तो ) के छींटे देकर भगवान्कानाम लिखकर गंगा की रज या व्रजरज दाल कर चारपाई से निचे सुला दे |

१२.👉 मृत्यु के समय तथा मृत्यु के बाद भी ‘नारायण’ नाम की याअपने ईस्टभगवान् के तुमुल धवनि करे | जब तक अर्थी चली न जाये ,तब तक यथा शक्य कोई घरवाले रोये नहीं |

१२.👉 उसके शव को दक्षिण की और पैर करके सुला दे | तदन्तर सुद्ध जल से स्नान करवाकर, नविन धुला हुआ वस्त्र पहनाकरजातिप्रथा के अनुसार शव यात्रा ले जाये ; पर पिंडदान का कार्य जानकार विद्वान के द्वारा अवस्य कराया जाये | शमशान में भी पिंडदान तथा अग्नि संस्कार का कार्य शास्त्र विधि के अनुसार किया जाये | रास्ते भर भगवन्नाम की ध्वनि, ‘हरीबोल’ ‘नारायण-नारायण’ के ध्वनि होती रहे | शमशान में भी भाग्वत चर्चा ही हो |

( संत-वाणी “नित्यलीलालीन श्रद्धेय भाईजी श्रीहनुमानप्रसाद पोद्धार” पुस्तक- “दुःख में भगवतकृपा”, गीताप्रेस गोरखपुर !)
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[07/04, 6:49 PM] Savitanandmishra: *चैत्र नवरात्रि घटस्थापना….*

नवरात्रका प्रयोग प्रारम्भ करनेके पहले सुगन्धयुक्त तैलके उद्वर्तनादिसे मङ्गलस्त्रान करके नित्यकर्म करे और स्थिर शान्तिके पवित्र स्थानमें शुभ मृत्तिकाकी वेदी बनाये । उसमें जौ और गेहूँ – इन दोनोंको मिलाकर बोये । वहीं सोने, चाँदी, ताँबे या मिट्टीके कलशको यथाविधि स्थापन करके गणेशादिका पूजन और पुण्याहवाचन करे और पीछे देवी ( या देव ) के समीप शुभासनपर पूर्व या उत्तर मुख बैठकर….
“मम महामायाभगवती वा मायाधिपति भगवत प्रीतये आयुर्बलवित्तारोयसमादरादिप्राप्तये वा नवरात्रव्रतमहं करिष्ये ।
यह संकल्प करके मण्डलके मध्यमें रखे हुए कलशपर सोने, चाँदी, धातु, पाषाण, मृत्तिका या चित्रमय मूर्ति विराजमान करे और उसका आवाहन आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्त्रान, वस्त्र, गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, ताम्बूल, नीराजन, पुष्पाञ्जलि, नमस्कार और प्रार्थना आदि उपचारोंसे पूजन करे ।
स्त्री हो या पुरुष, सबको नवरात्र करना चाहिये । यदि कारणवश स्वयं न कर सकें तो प्रतिनिधि ( पति पत्नी, ज्येष्ठ पुत्र, सहोदर या ब्राह्मण ) द्वारा करायें । नवरात्र नौ रात्रि पूर्ण होनेसे पूर्ण होता है । इसलिये यदि इतना समय न मिले या सामर्थ्य न हो तो सात, पाँच, तीन या एक दिन व्रत करे और व्रतमें भी उपवास, अयाचित, नक्त या एकभुक्त जो बन सके यथासामर्थ्य वही कर ले ।
यदि सामर्थ्य हो तो नौ दिनतक नौ ( और यदि सामर्थ्य न हो तो सात, पाँच, तीन या एक ) कन्याओंको देवी मानका उनको गन्ध – पुष्पादिसे अर्चित करके भोजन कराये और फिर आप भोजन करे । व्रतीको चाहिये कि उन दिनोंमें भुशयन, मिताहार, ब्रह्मचर्यका पालन, क्षमा, दया, उदारता एवं उत्साहदिकी वृद्धि और क्रोध, लोभ, मोहादिका त्याग रखे ।
चैत्रके नवरात्रमें शक्तिकी उपासना तो प्रसिद्ध ही हैं, साथ ही शक्तिधरकी उपासना भी की जाती है । उदाहरणार्थ एक ओर देवीभागवत कालिकापुराण, मार्कण्डेयपुराण, नवार्णमन्त्नके पुरश्चरण और दुर्गापाठकी शतसहस्त्रायुतचण्डी आदि होते हैं
*कलश स्थापना विधि:*
नवरात्रि में कलश स्थापना देव-देवताओं के आह्वान से पूर्व की जाती है। कलश स्थापना करने से पूर्व आपको कलश और खेतरी को तैयार करना होगा जिसकी सम्पूर्ण विधि नीचे दी गयी है
सबसे पहले मिट्टी के बड़े पात्र में थोड़ी सी मिट्टी डालें। और उसमे जवारे के बीज डाल दें।
अब इस पात्र में दोबारा थोड़ी मिटटी और डालें। और फिर बीज डालें। उसके बाद सारी मिट्टी पात्र में दाल दें और फिर बीज डालकर थोडा सा जल डालें।
(ध्यान रहे इन बीजों को पात्र में इस तरह से लगाएं की उगने पर यह ऊपर की तरफ उगें। यानी बीजों को खड़ी अवस्था में लगायें। और ऊपर वाली लेयर में बीज अवश्य डालें।
अब कलश और उस पात्र की गर्दन पर मोली बांध दें। साथ ही तिलक भी लगाएं।
इसके बाद कलश में गंगा जल भर दें।
इस जल में सुपारी, इत्र, दूर्वा घास, अक्षत और सिक्का भी दाल दें।
अब इस कलश के किनारों पर ५ अशोक के पत्ते रखें। और कलश को ढक्कन से ढक दें।
अब एक नारियल लें और उसे लाल कपडे या कल चुन्नी में लपेट लें। चुन्नी के साथ इसमें कुछ पैसे भी रखें।
इसके बाद इस नारियल और चुन्नी को रक्षा सूत्र से बांध दें।
तीनों चीजों को तैयार करने के बाद सबसे पहले जमीन को अच्छे से साफ़ करके उसपर मिट्टी का जौ वाला पात्र रखें। उसके ऊपर मिटटी का कलश रखें और फिर कलश के ढक्कन पर नारियल रख दें।
आपकी कलश स्थापना सम्पूर्ण हो चुकी है। इसके बाद सभी देवी देवताओं का आह्वान करके विधिवत नवरात्रि पूजन करें। इस कलश को आपको नौ दिनों तक मंदिर में ही रखे देने होगा। बस ध्यान रखें की खेतरी में सुबह शाम आवश्यकतानुसार पानी डालते रहें।
नवरात्री में नौ देवियों की पूजा होती है ये नौ देवियाँ है….
१. *शैलपुत्री* 🚩
“शैल” का अर्थ है पहाड़। चूंकि माँ दुर्गा पर्वतों के राजा, हिमालय के यहाँ पैदा हुई थीं, इसी वजह से उन्हे पर्वत की पुत्री यानि “शैलपुत्री” कहा जाता है।
२. *ब्रह्मचारिणी* 🚩
इसका तात्पर्य है- तप का पालन करने वाली या फिर तप का आचरण करने वाली। इसका मतलब यह भी होता है, कि एक में ही सबका समा जाना। इसका यह भी अर्थ निकलता है,कि यह सम्पूर्ण संसार माँ दुर्गा का एक छोटा सा अंश मात्र ही है।
३. *चंद्रघंटा* 🚩
माता के इस रूप में उनके मस्तक पर घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र अंकित है। इसी वजह से माँ दुर्गा का नाम चंद्रघण्टा भी है।
४. *कूष्मांडा* 🚩
इसका अर्थ समझने के लिए पहले इस शब्द को थोड़ा तोड़ा जाए। ‘कू’ का अर्थ होता है- छोटा। ‘इश’ का अर्थ- ऊर्जा एवं ‘अंडा’ का अर्थ- गोलाकार। इन्हें अगर मिलाया जाए तो इनका यही अर्थ है, कि संसार की छोटी से छोटी चीज़ में विशाल रूप लेने की क्षमता होती है।
५. *स्कंदमता* 🚩
दरअसल भगवान शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का एक अन्य नाम स्कन्द भी है। अतः भगवान स्कन्द अर्थात कार्तिकेय की माता होने के कारण मां दुर्गा के इस रूप को स्कन्दमाता के नाम से भी लोग जानते हैं।
६. *कात्यायनी* 🚩
एक कथा के अनुसार महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उनके वरदान स्वरूप माँ दुर्गा उनके यहाँ पुत्री के रूप में पैदा हुई थीं। चूंकि महर्षि कात्यायन ने ही सबसे पहले माँ दुर्गा के इस रूप की पूजा की थी, अतः महर्षि कात्यायन की पुत्री होने के कारण माँ दुर्गा कात्यायनी के नाम से भी जानी जाती हैं।
७. *कालरात्रि* 🚩
मां दुर्गा के इस रूप को अत्यंत भयानक माना जाता है, यह सर्वदा शुभ फल ही देता है, जिस वजह से इन्हें शुभकारी भी कहते हैं। माँ का यह रूप प्रकृति के प्रकोप के कारण ही उपजा है।
८. *महागौरी* 🚩
माँ दुर्गा का यह आठवां रूप उनके सभी नौ रूपों में सबसे सुंदर है। इनका यह रूप बहुत ही कोमल, करुणा से परिपूर्ण और आशीर्वाद देता हुआ रूप है, जो हर एक इच्छा पूरी करता है.
९. *सिद्धिदात्री* 🚩
माँ दुर्गा का यह नौंवा और आखिरी रूप मनुष्य को समस्त सिद्धियों से परिपूर्ण करता है। इनकी उपासना करने से उनके भक्तों की कोई भी इच्छा पूर्ण हो सकती है। माँ का यह रूप आपके जीवन में कोई भी विचार आने से पूर्व ही आपके सारे काम को पूरा कर सकता है।
पूजा का कृत्य प्रारम्भ। प्रातःकाल नित्य स्नानादि कृत्य से फुरसत होकर पूजा के लिए पवित्र वस्त्र पहन कर उपरोक्त पूजन सामग्री व श्रीदुर्गासप्तशती की पुस्तक ऊँचे आसन में रखकर, पवित्र आसन में पूर्वाविमुख या उत्तराभिमुख होकर भक्तिपूर्वक बैठे और माथे पर चन्दन का लेप लगाएं, पवित्री मंत्र बोलते हुए पवित्री करण, आचमन, आदि को विधिवत करें। तत्पश्चात् दायें हाथ में कुश आदि द्वारा पूजा का संकल्प करे। आज ही नवरात्री मे नवदुर्गा पूजन हेतु अपना स्थान सुरक्षित करे |
*सभी प्रकार की कामनाओ हेतु :*
*०१)*
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यषो देहि द्विषो जहि।।
अगर आप की अनावश्यक विलम्ब हो रहा है तो इस मंत्र का प्रयोग करते हुए पाठ करे
*०२)*
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्।।
*रोग से छुटकारा पाने के लिए:*
*०३)*
रोगानषेषानपहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।
*पूजन करने की विधि:*
मंत्रों से तीन बार आचमन करें।
*०४)*
मंत्र ॐ केशवाय नमः,
ॐ नारायणाय नमः,
ॐ माधवाय नमः
*०५)*
हृषिकेषाय नमः बोलते हुए हाथ धो लें।
*०६) आसन धारण के मंत्र:*
ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरू चासनम्।।
*०७) पवित्रीकरण हेतु मंत्र:*
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षंतद्बाह्याभ्यन्तरं शुचि।।
*०८) चंदन लगाने का मंत्रः*
ॐ आदित्या वसवो रूद्रा विष्वेदेवा मरूद्गणाः। तिलकं ते प्रयच्छन्तु धर्मकामार्थसिद्धये।।
रक्षा सूत्र मंत्र (पुरूष को दाएं तथा स्त्री को बांए हाथ में बांधे)
*०९) मंत्रः*
ॐ येनबद्धोबली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।तेनत्वाम्अनुबध्नामि रक्षे माचल माचल ।।
*१०) दीप जलाने का मंत्रः*
ॐ ज्योतिस्त्वं देवि लोकानां तमसो हारिणी त्वया। पन्थाः बुद्धिष्च द्योतेताम् ममैतौ तमसावृतौ।।
*११) संकल्प की विधिः*
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः, ॐ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरूषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपराद्र्धे श्रीष्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे- ऽष्टाविंषतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे
श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुकषर्मा अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतोल
आदि मंत्रो को शुद्धता से बोलते हुए शास्त्री विधि से पूजा पाठ का संकल्प लें।
प्रथमतः श्री गणेश जी का ध्यान, आवाहन, पूजन करें।
*१२) श्री गणश मंत्र:*
ॐ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।
निर्विध्नं कुरू मे देव सर्वकायेषु सर्वदा।।
*कलश स्थापना के नियम :–*
पूजा हेतु कलश सोने, चाँदी, तांबे की धातु से निर्मित होते हैं, असमर्थ व्यक्ति मिट्टी के कलश का प्रयोग करत सकते हैं। ऐसे कलश जो अच्छी तरह पक चुके हों जिनका रंग लाल हो वह कहीं से टूटे-फूटे या टेढ़े न हो, दोष रहित कलश को पवित्र जल से धुल कर उसे पवित्र जल गंगा जल आदि से पूरित करें। कलश के नीचे पूजागृह में रेत से वेदी बनाकर जौ या गेहूं को बौयें और उसी में कलश कुम्भ के स्थापना के मंत्र बोलते हुए उसे स्थाति करें। कलश कुम्भ को विभिन्न प्रकार के सुगंधित द्रव्य व वस्त्राभूषण अंकर सहित पंचपल्लव से आच्छादित करें और पुष्प, हल्दी, सर्वोषधी अक्षत कलश के जल में छोड़ दें। कुम्भ के मुख पर चावलों से भरा पूर्णपात्र तथा नारियल को स्थापित करें। सभी तीर्थो के जल का आवाहन कुम्भ कलश में करें।
*१३) आवाहन मंत्र करें:*
ॐ कलषस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रूद्रः समाश्रितः।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।।
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू ।।
*षोडषोपचार पूजन प्रयोग विधि –*
*१४) आसन (पुष्पासनादि):*
ॐ अनेकरत्न-संयुक्तं नानामणिसमन्वितम्। कात्र्तस्वरमयं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम्।।
*१५) पाद्य (पादप्रक्षालनार्थ जल):*
ॐ तीर्थोदकं निर्मलऽचसर्वसौगन्ध्यसंयुतम्। पादप्रक्षालनार्थाय दत्तं तेप्रतिगृह्यताम्।।
*१६) अघ्र्य (गंध पुष्प्युक्त जल):*
ॐ गन्ध-पुष्पाक्षतैर्युक्तं अध्र्यंसम्मपादितं मया।गृह्णात्वेतत्प्रसादेन अनुगृह्णातुनिर्भरम्।।
*१७) आचमन (सुगन्धित पेय जल):*
ॐ कर्पूरेण सुगन्धेन वासितं स्वादु षीतलम्। तोयमाचमनायेदं पीयूषसदृषं पिब।।
*१८) स्नानं (चन्दनादि मिश्रित जल):*
ॐ मन्दाकिन्याः समानीतैः कर्पूरागरूवासितैः।पयोभिर्निर्मलैरेभिःदिव्यःकायो हि षोध्यताम्।।
*१९) वस्त्र (धोती-कुत्र्ता आदि):*
ॐ सर्वभूषाधिके सौम्ये लोकलज्जानिवारणे। मया सम्पादिते तुभ्यं गृह्येतां वाससी षुभे।।
*२०) आभूषण (अलंकरण):*
ॐ अलंकारान् महादिव्यान् नानारत्नैर्विनिर्मितान्। धारयैतान् स्वकीयेऽस्मिन् षरीरे दिव्यतेजसि।।
*२१) गन्ध (चन्दनादि):*
ॐ श्रीकरं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। वपुषे सुफलं ह्येतत् षीतलं प्रतिगृह्यताम्।।
*२२) पुष्प (फूल):*
ॐ माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि भक्त्तितः।
मयाऽऽहृतानि पुष्पाणि पादयोरर्पितानि ते।।
*२३) धूप (धूप):*
ॐ वनस्पतिरसोद्भूतः सुगन्धिः घ्राणतर्पणः।सर्वैर्देवैः ष्लाघितोऽयं सुधूपः प्रतिगृह्यताम्।।
*२४) दीप (गोघृत):*
ॐ साज्यः सुवर्तिसंयुक्तो वह्निना द्योतितो मया।गृह्यतां दीपकोह्येष त्रैलोक्य-तिमिरापहः।।
*२५) नैवेद्य (भोज्य)*
ॐ षर्कराखण्डखाद्यानि दधि-क्षीर घृतानि च। रसनाकर्षणान्येतत् नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्।।
*२६) आचमन (जल)*
ॐ गंगाजलं समानीतं सुवर्णकलषस्थितम्। सुस्वादु पावनं ह्येतदाचम मुख-षुद्धये।।
*२७) दक्षिणायुक्तताम्बूल(द्रव्य पानपत्ता):*
ॐ लवंगैलादि-संयुक्तं ताम्बूलं दक्षिणां तथा। पत्र-पुष्पस्वरूपां हि गृहाणानुगृहाण माम्।।
*२८) आरती (दीप से):*
ॐ चन्द्रादित्यौ च धरणी विद्युदग्निस्तथैव च। त्वमेव सर्व-ज्योतींषि आर्तिक्यं प्रतिगृह्यताम्।।
*२९) परिक्रमाः*
ॐ यानि कानि च पापानि जन्मांतर-कृतानि च। प्रदक्षिणायाः नष्यन्तु सर्वाणीह पदे पदे।।
भागवती एवं उसकी प्रतिरूप देवियों की एक परिक्रमा करनी चाहिए।यदि चारों ओर परिक्रमा का स्थान न हो तो आसन पर खड़े होकर दाएं घूमना चाहिए।
*३०) क्षमा प्रार्थना:*
ॐ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि भक्त एष हि क्षम्यताम्।। अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम। तस्मात्कारूण्यभावेन भक्तोऽयमर्हति क्षमाम्।। मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं तथैव च। यत्पूजितं मया ह्यत्र परिपूर्ण तदस्तु मे।।
*३१ )*
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पष्यन्तु मा कष्चिद् दुःख-भाग्भवेत् ।

– डॉ0 विजय शंकर मिश्र:
[07/04, 6:49 PM] Savitanandmishra: चैत्र नवरात्रि में इन 12 सरल उपायों से करें देवी नवदुर्गा को प्रसन्न

चैत्र नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा विशेष फलदायी है। नवरात्रि ही ऐसा पवित्र पर्व है जिसमें महाकाली, महालक्ष्मी और मां सरस्वती की साधना कर मनचाही सिद्धियां-उपलब्धियां हासिल की जा सकती है। मां दुर्गा की कृपा प्राप्ति के लिए कुछ सरल उपाय नीचे दिए जा रहे हैं।
1- अपने घर के पूजा स्थान में भगवती दुर्गा, भगवती लक्ष्मी और मां सरस्वती के चित्रों की स्थापना करके उनको फूलों से सजाकर पूजन करें।
2- नौ दिनों तक माता का व्रत रखें। अगर शक्ति न हो तो पहले, चौथे और आठवें दिन का उपवास अवश्य करें। मां भगवती की कृपा जरूर प्राप्त होगी।
3- नौ दिनों तक घर में मां दुर्गा के नाम की ज्योत अवश्य जलाएं।
4- अधिक से अधिक नवार्ण मंत्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै’ का जाप अवश्य करें।
5- इन दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ अवश्य करें।
6- पूजन में हमेशा लाल रंग के आसन का उपयोग करना उत्तम होता है। आसन लाल रंग का और ऊनी होना चाहिए।
7- लाल रंग का आसन न होने पर कंबल का आसन इतनी मात्रा में बिछाकर उस पर लाल रंग का दूसरा कपड़ा डालकर उस पर बैठकर पूजन करना चाहिए।
8- पूजा पूरी होने के पश्चात आसन को प्रणाम करके लपेटकर सुरक्षित जगह पर रख दीजिए।
9 – पूजा के समय लाल वस्त्र पहनना शुभ होता है। लाल रंग का तिलक भी जरूर लगाएं। लाल कपड़ों से आपको एक विशेष ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
10- मां को प्रात: काल के समय शहद मिला दूध अर्पित करें। पूजन के पास इसे ग्रहण करने से आत्मा व शरीर को बल प्राप्ति होती है। यह एक उत्तम उपाय है।
11- आखिरी दिन घर में रखीं पुस्तकें, वाद्य यंत्रों, कलम आदि की पूजा अवश्य करें।
12- अष्टमी व नवमी के दिन कन्या पूजन करें।
विशेष – मां दुर्गा को तुलसी दल और दूर्वा चढ़ाना निषिद्ध है।

– डॉ0 विजय शंकर मिश्र
[07/04, 10:15 PM] Savitanandmishra: *जीवन यात्रा बने एक पर्वोत्सव*
मनुष्य के हृदय भण्डार का द्वार खोलने वाली, निम्नता से उच्चता की ओर ले जाने वाली यदि कोई वस्तु है, तो प्रसन्नता ही है। यही वह साँचा है, जिसमें ढ़लकर मनुष्य अपने जीवन का सर्वतोमुखी विकास कर सकता है। जीवन-यापन के लिए जहाँ उसे धन, वस्त्र, भोजन एवं जल की आवश्यकता पड़ती है, वहाँ उसे हलका-फुलका एवं प्रगतिशील बनाने के लिए प्रसन्नता भी आवश्यक है।प्रसन्नता मरते हुए मनुष्य में प्राण फूँकने के समान है। प्रसन्न और संतुष्ट रहने वाले व्यक्तियों का ही जीवन ज्योतिपुंज बनकर दूसरों का मार्गदर्शन करने में सक्षम होता है। अगर तुम हँसोगे तो सारी दुनिया तुम्हारे साथ हँसेगी और अगर तुम रोओगे तो कोई तुम्हारा साथ न देगा।प्रसन्न व्यक्ति को देखकर दूसरे व्यक्ति स्वयं ही खुश होने लगते हैं। प्रसन्न चित्त व्यक्ति के पास बैठकर दुःखी व्यक्ति भी थोड़ी देर के लिए प्रसन्नता के प्रवाह में अपने दुःख को भूल जाता है।जो व्यक्ति हर समय मुँह फुलाए रहता है,वह जीवन के प्राण उसके संजीवनी तत्त्व को नष्ट कर देता है।ऐसे व्यक्तियों के पास उठना -बैठना कोई पसंद नहीं करता। खिन्नता नरक की भयानक ज्वाला की भाँति मनुष्य को दीन, हीन, दुःखी एवं दरिद्र बना देती है।अप्रसन्न प्रकृति का व्यक्ति दूसरों को भी हँसता नहीं देख सकता। दूसरे हँसते हैं, तो ऐसा लगता है कि ये सभी लोग हमारा मजाक बना रहे हैं। ऐसे लोग, प्रसन्नता की जीवन में क्या उपयोगिता है,इस तथ्य को भली -भाँति समझ नहीं पाते। उनका स्वभाव बन जाता है, दूसरों को देखकर हँसना, दूसरों का मजाक बनाना, दूसरों के नुकसान पर हँसना। समय, परिस्थिति एवं वातावरण का ध्यान किये बिना असभ्य ढंग से हँसने का हमें ध्यान रखना चाहिए कि यह हास्य, जीवन -विकास में सहायक नहीं होता, उलटे मनुष्य के अन्दर आसुरी प्रवृत्तियों को जन्म देता है और जीवन को दुरूह बना देता है। हमें ऐसी हँसी को अपने अंदर स्थान देना चाहिए, जो मनहूसों को भी हँसा दे, दुःखी को खुश कर दे।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
[07/04, 10:15 PM] Savitanandmishra: 📔गायत्री महाविज्ञान📔
*शीर्षक – गायत्री साधना निष्फल नही जाती*
✍🏻साधक को अपनी अनुकूल परिस्थितियों के हिसाब से पंचमुखी गायत्री साधना में से एक को चुन लेना चाहिए। इससे साधक को सफलता मिलती है।
✍🏻साधना आरंभ करते ही चित्त में सात्विकता, शांति, प्रफुल्लता, उत्त्साह, आशा बढ़ जाती है और मानसिक बोझ हल्के हो जाते हैं।
✍🏻जो साधक गायत्री उपासना द्वारा मन को सयंमित कर लेता है, वह विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नही होता।माँ का सानिध्य ही साधक को आगे बढ़ने के लिये प्रयत्नशील करता है।
✍🏻गायत्री साधना से साधक का मानसिक बल बढ़ता है, आत्म दृश्यता आती है, आत्म निर्भरता बढ़ती है। विपरीत परिस्थितियों में भी आशा व उत्साह बना रहता है।
✍🏻गायत्री साधना से साधक का कायाकल्प हो जाता है। इससे शरीर की जीर्णता दूर होकर नवीनता प्राप्त होती है, जिससे व्यक्ति का शारीरिक ही नहीं मस्तिष्क, दृष्टिकोण, स्वभाव, चित्त का भी कायाकल्प हो जाता है। स्वास्थ्य, मनोबल, सांसारिक सुख सौभाग्य में वृद्धि होती है।
✍🏻गुरुदेव ने कहा है- सकाम उपासना की अपेक्षा निष्काम उपासना श्रेष्ठ है। यह कभी निष्फल नही जाती।
✍🏻जब साधना से कामनाओं को हटा दिया जाए, तो साधक की भक्तिपूर्वक साधना से सफलता का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
✍🏻जो साधक गयात्री साधना में जितना समय, श्रम, धन, मनोयोग लगाता है, वह कई गुना होकर निश्चित रूप से साधक के पास वापिस आता है।बस आवश्यकता इस बात की है कि हम धैर्य, स्थिरता, विवेक, मनोयोगपूर्ण कदम बढ़ाएं।
*क्रमश——–*
[07/04, 10:15 PM] Savitanandmishra: युग तुलसी श्रीरामकिंकर उवाच……..
काकभुशुण्डिजी का जन्म अयोध्या में हुआ। वही अयोध्या, वही राम, किंतु तब वे उसका रस नहीं ले पाए। इसका कारण वही उलटे घड़े का रोग था। जैसे किसी पित्त-ज्वर से पीड़ित व्यक्ति को मिश्री खाने को दी जाए, तो वह उसे कड़वी लगती है। अब मिठास उसे कैसे मिलेगी ? उसके लिए मिश्री को मीठा बनाने की आवश्यकता नहीं है उसके मुंह में जो कड़वापन है, उसी को दूर करने की आवश्यकता है। अभिप्राय यह है कि वह व्यक्ति अपने ही मन के दोषों के कारण इस रस को ग्रहण करने में असमर्थ है। रस में परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उस रस को ग्रहण करने में हमारा जो मानसिक विकार बाधक है, उसे दूर करने का प्रयत्न करके हम स्वस्थता प्राप्त करें। जैसे पित्त-ज्वर दूर होते ही व्यक्ति को मिश्री की मिठास की अनुभूति होने लगती है, उसी प्रकार भगवच्चरित्र में, भगवद्गुण में, भगवत्कृपा में रसानुभूति के लिए भी मन का स्वस्थ होना आवश्यक है।
[07/04, 10:15 PM] Savitanandmishra: 🌞 ~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞
⛅ *दिनांक 08 अप्रैल 2021*
⛅ *दिन – गुरुवार*
⛅ *विक्रम संवत 25 चैत्र – 2077*
⛅ *शक संवत – 1942*
⛅ *अयन – उत्तरायण*
⛅ *ऋतु – वसंत*
⛅ *मास – चैत्र (गुजरात एवं महाराष्ट्र अनुसार – फाल्गुन)*
⛅ *पक्ष – कृष्ण*
⛅ *तिथि – द्वादशी 09 अप्रैल रात्रि 03:15 तक तत्पश्चात त्रयोदशी*
⛅ *नक्षत्र – शतभिषा 09 अप्रैल प्रातः 04:58 तक तत्पश्चात पूर्व भाद्रपद*
⛅ *योग – शुभ शाम 01:52 तक तत्पश्चात शुक्ल*
⛅ *राहुकाल – दोपहर 02:14 से शाम 03:48 तक*
⛅ *सूर्योदय – 06:27*
⛅ *सूर्यास्त – 18:53*
⛅ *दिशाशूल – दक्षिण दिशा में*
⛅ *व्रत पर्व विवरण –
💥 *विशेष – द्वादशी को पूतिका(पोई) अथवा त्रयोदशी को बैंगन खाने से पुत्र का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*
🌷 *घमौरियों हों तो* 🌷
👉🏻 *नीम के १० ग्राम फूल व थोड़ी मिश्री पीसकर पानी में मिला के खाली पेट पी लें | इससे घमौरियाँ शीघ्र गायब हो जायेंगी |*
👉🏻 *नारियल तेल में नींबू-रस मिलाकर लगाने से घमौरियाँ गायब हो जाती हैं |*
👉🏻 *मुलतानी मिट्टी लगा के कुछ मिनट बाद स्नान करने से गर्मी और घमौरियों का शमन होता है 🌷 *प्रदोष व्रत* 🌷
🙏🏻 *हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक महिने की दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत किया जाता है। ये व्रत भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। इस बार 09 अप्रैल, शुक्रवार को प्रदोष व्रत है। इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है। प्रदोष पर व्रत व पूजा कैसे करें और इस दिन क्या उपाय करने से आपका भाग्योदय हो सकता है, जानिए…*
👉🏻 *ऐसे करें व्रत व पूजा*
🙏🏻 *- प्रदोष व्रत के दिन सुबह स्नान करने के बाद भगवान शंकर, पार्वती और नंदी को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराएं।*
🙏🏻 *- इसके बाद बेल पत्र, गंध, चावल, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य (भोग), फल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची भगवान को चढ़ाएं।*
🙏🏻 *- पूरे दिन निराहार (संभव न हो तो एक समय फलाहार) कर सकते हैं) रहें और शाम को दुबारा इसी तरह से शिव परिवार की पूजा करें।*
🙏🏻 *- भगवान शिवजी को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं। आठ दीपक आठ दिशाओं में जलाएं।*
🙏🏻 *- भगवान शिवजी की आरती करें। भगवान को प्रसाद चढ़ाएं और उसीसे अपना व्रत भी तोड़ें।उस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें।*
👉🏻 *ये उपाय करें*
*सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद तांबे के लोटे से सूर्यदेव को अर्ध्य देें। पानी में आकड़े के फूल जरूर मिलाएं। आंकड़े के फूल भगवान शिवजी को विशेष प्रिय हैं । ये उपाय करने से सूर्यदेव सहित भगवान शिवजी की कृपा भी बनी रहती है और भाग्योदय भी हो सकता है।*
🙏🏻🌷💐🌸🌼🌹🍀🌺💐🙏🏻
[07/04, 10:15 PM] Savitanandmishra: *बोर्नविटा, कॉम्प्लान आदि पर हज़ारों रुपये खर्च करने की बजाये, बादाम रोगन ख़रीदें।*
●●● सोने से पूर्व आँखों के चारों ओर बादाम रोगन की हल्की-हल्की मालिश करने से चेहरे पर निखार आता है और झुर्रियां नहीं पड़ती।
●●● सिर की खुश्की मिटाने के लिए सिर पर बादाम रोगन की मालिश करें।
●●● बाल न झड़े, इसके लिए भी सिर पर बादाम रोगन की मालिश करते हैं।
●●● रात में गाय के गर्म दूध में से चम्मच बादाम रोगन दाल कर पिने से दिमाग तेज़ होता है।
●●● बादाम रोगन गरम दूध में डाल कर पीने से कब्ज दूर होती है।
●●● नाक में दो-दो बूंद बादाम रोगन रात में सोते वक्त डालने से आँखों की ज्योति तेज़ होती है।
●●● ये नस्य दिमाग भी तेज़ करता है।
●●● बादाम रोगन के नस्य से सिर दर्द दूर होता है।
●●● यदि सुनने की शक्ति कम होने का भय हो तो बादाम रोगन की एक-एक बूंद प्रतिदिन डालें।
●●● आंवले के रस के साथ बादाम तेल की मालिश बालों का झड़ना, असमय सफेद होना, पतला होना और डैंड्रफ रोक सकती है।
●●● दो-तीन बूंद बादामरोगन व एक चम्मच शहद की मालिश रोमकूप खोल चेहरे पर चमक लाती है।
●●● इसका सेवन तनाव कम करता है।
●●● ये हार्ट के लिए लाभदायक है।
●●● सर्दियों में शरीर का तापमान बनाए रखता है।
●●● छोटे बच्चों के लिए लाभदायक है।
वजन घटाने में मदद करता है।
●●● गर्दन में दर्द होने पर इससे मालिश करने पर ठीक हो जाता है।
इसकी सिर में मालिश करने से नींद अच्छी आतीहै…!

नेचुरोपैथ कौशल
9215522667
[07/04, 10:20 PM] Savitanandmishra: विविध संक्रमणो से बचनें हेतु सनातन धर्म के शास्त्रीय नियम 🙏😊
१ »
लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च ।
लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत् ।।
धर्मसिन्धू ३पू. आह्निक
अर्थात् नमक, घी, अन्न तथा सभी प्रकार के व्यञ्जन चमचसे ही परोसने चाहीये हाथ से परोसे हुए नहीं खाने चाहिये ।।
२ »
अनातुरः स्वानि खानि न स्पृशेदनिमित्ततः ।।
मनुस्मृति ४/१४४
अर्थात् बिना कारण अपनी इन्द्रियों (नाक, कान, इत्यादी) को न छूंए ।।
३ »
अपमृज्यान्न च स्न्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभिः ।।
मार्कण्डेय पुराण ३४/५२
अर्थात् स्न्नान करने के बाद अपने हाथों से या स्नान के समय पहने भीगे वस्त्रो से शरीर को नहीं पोंछना चाहिये ।।
४ »
हस्तपादे मुखे चैव पञ्चाद्रे भोजनं चरेत् ।।
पद्म०सृष्टि.५१/८८
नाप्रक्षालितपाणिपादो भुञ्जीत ।।
सुश्रुतसंहिता चिकित्सा २४/९८
अर्थात् हाथ पैर मुख धोकर भोजन करना चाहीये ।।
५ »
स्न्नानाचारविहीनस्य सर्वाः स्युः निष्फलाः क्रियाः ।।
वाघलस्मृति ६९
अर्थात् स्नान और शुद्ध आचार के बिना सभि कार्य निष्फल होजाते है ।।
६ »
न धारयेत् परस्यैवं स्न्नानवस्त्रं कदाचन ।।
पद्म०सृष्टि.५१/८६
अर्थात् दुसरो के स्न्नान के वस्त्र तौलिया इत्यादि प्रयोगमें नहीं लेने चाहीये ।।
७ »
अन्यदेव भवद्वासः शयनीये नरोत्तम ।
अन्यद् रथ्यासु देवानाम् अर्चायाम् अन्यदेव हि ।।
महाभारत अनु० १०४/८६
अर्थात् शयनके समय, घरसे बहार घूमते समय, पूजन के समय अलग अलग वस्त्र होने चाहिये ।।
८ »
तथा न अन्यधृतं (वस्त्रं) धार्यम् ।।
महाभारत अनु० १०४/८६
अर्थात् दूसरो के पहेने कपडे नहीं पहनने चाहिये ।।
९ »
न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं वसनं बिभृयाद् ।।
विष्णुस्मृति ६४
अर्थात् पहने हुये वस्त्र को बिना धोये पुनः नहि धारण करना चाहिये ।।
१० »
न आद्रं परिदधीत ।।
गोभिसगृह्यसूत्र ३/५/२४
अर्थात् गीले वस्त्र नहीं पहनने चाहिये ।।
११ »
चिताधूमसेवने सर्वे वर्णाः स्न्नानम् आचरेयुः ।
वमने श्मश्रुकर्मणि कृते च ।
विष्णुस्मृति २२
अर्थात् श्मशान भूमि में जाने पर, वमन (उलटि) होने पर हजामत करने पर सभी वर्णो के मनुष्यो को स्नान करना चाहिये ।।
[07/04, 10:20 PM] Savitanandmishra: *(सामुद्रिक शास्त्र) सिर की बनावट देखकर जाने स्वभाव*
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👉 जिन लोगों के सिर की लंबाई ज्यादा हो और चौड़ाई कम हो ऐसे लोग जीवन में सभी सुविधाएं प्राप्त करते हैं।

👉 जिस व्यक्ति का सिर आकार में मध्यम रहता है वे लोग पैसों के मामले में काफी भाग्यशाली रहते हैं।

👉 यदि किसी व्यक्ति का सिर अन्य लोगों की अपेक्षा अलग दिखता है, बड़ा और चौड़ा होता है वे लोग जीवन में काफी परेशानियां का सामना करते हैं।

बालों को देखकर जानें
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👉 जिस व्यक्ति के बाल काले और मुलायम और सुंदर होते हैं वे धनी होते हैं और सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त करते हैं।

👉 जिन लोगों के बाल पतले होते हैं वे लोग अच्छे स्वभाव के लोग होते हैं।

👉 रूखे और सख्त बाल वाले लोग बहादुर होते हैं, लेकिन वे संकुचित मानसिकता वाले होते हैं।

👉 एकदम सूर्ख रंग के बाल वाले लोग गरीब और परेशान होते हैं। जबकि सुनहरे बाल वाले लोगों का जीवन स्तर मध्यम रहता है।

भौंहें देखकर जानिए ये बातें
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👉 सुंदर और बारिक भौंहे वाले व्यक्ति धन संबंधी कार्यों में विशेष लाभ कमाने वाले होते हैं।

👉 जिन लोगों की दोनों भौंहे आपस में मिली हुई होती हैं वे अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक चतुर और चालक होते हैं।

👉 यदि किसी व्यक्ति की भौंहों के बाल रूखे और बेजान दिखाई देते हैं वे लोग जीवन में धन की कमी का सामना करते हैं। इन का लोगों का व्यवहार काफी सख्त होता है।

👉 ऐसे लोगों को जीवन में पूर्ण ऐश्वर्य मिलता है, जिनकी भौंहें चौड़ी होती हैं और आपस में मिलती नहीं हैं।

आंखें देखकर जानिए ये बातें
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👉 यदि किसी व्यक्ति की आंखें बिल्ली की आंखों के समान दिखाई देती हैं तो वह इंसान दुराचारी हो सकता है।

👉 जिन लोगों की आंखों में सूर्ख रंग के डोरे दिखाई देते हैं वे लोग जीवन में पूर्ण सुख-सुविधाएं प्राप्त करते हैं। यदि ऐसी आंखें किसी स्त्री की हों तो वह काफी अधिक धन लाभ अर्जित करती हैं।

👉 जिन लोगों की आंखों में हमेशा गुस्सा दिखाई देता है वे लोग बहादुर होते हैं और साहस के बल पर कार्य पूर्ण कर लेते हैं।

कान देखकर जानिए ये बातें
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👉 जिन लोगों के कान सामान्य आकार से अधिक लंबे दिखाई देते हैं वे लोग लंबी उम्र जीते हैं और इन्हें काफी पैसा भी प्राप्त होता है।

👉 लंबे और पतले कान वाले लोग अच्छे स्वभाव वाले और समाज में मान-सम्मान प्राप्त करने वाले होते हैं।

👉 जिन लोगों के कान पर अधिक बाल दिखाई देते हैं वे मेहनत करते हैं लेकिन उचित फल प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

👉 छोटे कान वाले लोगों का जीवन सामान्य होता है। यदि ये लोग अधिक मेहनत करते हैं तो सकारात्मक फल अवश्य प्राप्त होते हैं।

नाक देखकर जानिए ये बातें
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👉 जिन लोगों की नाक ऊंची और बड़ी होती है वे भाग्यशाली होते हैं और जीवन में कई उपलब्धियां हासिल करते हैं।

👉 ऐसे लोग बहुत समझदार और किस्मत के धनी होते हैं, जिनकी नाक तोते की चोंच के समान होती हैं। ऐसी तीखी नाक वाले लोग दिमागी कार्य में पारंगत होते हैं।

👉 जिन लोगों की नाक छोटी सी दिखाई देती है वे लोग स्वभाव से अच्छे होते हैं। जबकि छोटी और मोटी नाक वाले लोगों को कम अक्ल होते हैं।

पलक देखिए और जानिए ये बातें
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👉 यदि किसी व्यक्ति की पलक पर बाल बहुत कम हैं तो वह इंसान शौकिन मिजाज होता है। ऐसे लोग शान और शौकत में जीवन व्यतीत करते हैं।

👉 ऐसे लोग गरीब होते हैं जिन लोगों की पलक के बाल सख्त होते हैं। इन लोगों को जीवन में काफी परिश्रम करना पड़ता है, लेकिन सकारात्मक फल प्राप्त नहीं हो पाता है।
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*Punjab National Bank Palwal*
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[07/04, 10:20 PM] Savitanandmishra: जब किसी की मृत्यु होती थी तब भी 13 दिन तक उस घर में कोई प्रवेश नहीं करता था यही आइसोलेशन था क्योंकि मृत्यु या तो किसी बीमारी से होती है या वृद्धावस्था के कारण जिसमें शरीर तमाम रोगों का घर होता है।
यह रोग हर जगह न फैले इसलिए 14 दिन का क्वॉरंटीन बनाया गया ,

जो शव को अग्नि देता था उसको घर वाले तक नहीं छू सकते थे
13 दिन तक उसका खाना पीना, भोजन, बिस्तर, कपड़े सब अलग कर दिए जाते थे।
तेरहवें दिन शुद्धिकरण के पश्चात, सिर के बाल हटवाकर ही पूरा परिवार शुद्ध होता था लेकिन तब भी आप बहुत हँसे थे….. ब्लडी इंडियन कहकर खूब मजाक बनाया था

जब मां बच्चे को जन्म देती है तो जन्म के 11 दिन तक बच्चे व माँ को कोई नही छूता था ताकि जच्चा और बच्चा किसी इंफेक्शन के शिकार ना हों और वह सुरक्षित रहे लेकिन इस परम्परा को पुराने रीति रिवाज, ढकोसला कह कर त्याग दिया गया।

जब किसी के शव यात्रा से लोग आते हैं घर में प्रवेश नहीं मिलता है और बाहर ही हाथ पैर धोकर स्नान करके, कपड़े वहीं निकालकर घर में आया जाता है, इसका भी खूब मजाक उड़ाया आपने।

आज भी गांवों में एक परंपरा है कि बाहर से कोई भी आता है तो उसके पैर धुलवायें जाते हैं।
जब कोई भी बहू लड़की या कोई भी दूर से आता है तो वह तब तक प्रवेश नहीं पाता जब तक घर की बड़ी बूढ़ी लोटे में जल लेकर, हल्दी डालकर उस पर छिड़काव करके वही जल बहाती नहीं हों, तब तक। खूब मजाक बनाया था न…. आज भी आप झूठी आधुनिकता के नाम पर अपने सनातन धर्म का खूब अपमान करते है।

किसी भी तरह के संक्रमण के अंदेशा वाले कार्य करने वाले लोगो को लोग तब तक नहीं छूते थे जब तक वह स्नान न कर ले…..लेकिन पाश्चात्य सभ्यता के रंग में रंगे लोगो ने इसको भी दकियानूसी कहकर खूब मजाक उड़ाया

लेकिन आज जब आपको किसी को छूने से मना किया जा रहा है तो आप इसे ही विज्ञान बोलकर अपना रहे हैं।
क्वॉरंटीन किया जा रहा है तो आप खुश होकर इसको अपना रहे हैं

लेकिन शास्त्रों के उन्हीं वचनों को तो हम सब भुला दिये और अपने ही सनातन धर्म का अपमान करते रहे।

आज यह उसी की परिणति है कि पूरा विश्व इससे जूझ रहा है।

याद करिये पहले जब आप बाहर निकलते थे तो आप की माँ आपको जेब में कपूर या हल्दी की गाँठ इत्यादि देती थी रखने को। क्योंकि यह सब कीटाणु रोधी होते हैं।

शरीर पर कपूर पानी का लेप करते थे ताकि सुगन्धित भी रहें और रोगाणुओं से भी बचे रहें। लेकिन सब आपने भुला दिया।

अरे समझिए अपने शास्त्रों के स्तर को, हमारे ऋषि मुनि वैज्ञानिक ही थे।
जिस दिन हम सब अपनी संस्क्रति समझेंगे ,
उसी दिन यह देश विश्व गुरु बन जाएगा।
🙏ilu dost jai ho 🙏
[07/04, 10:20 PM] Savitanandmishra: *बलि-वैश्व की पाँच आहुतियों से जुड़े पंचशील*

बलि-वैश्व की पाँच आहुतियों को पंच महायज्ञ कहा गया है। बोलचाल की भाषा में किसी शब्द के साथ महा लगा देने पर उसका अर्थ बड़ा-बहुत बड़ा हो जाता है। यज्ञ शब्द से भी सामूहिक अग्निहोत्र को बोध होता है। इसके पहले महा शब्द जोड़ देने का अर्थ हुआ कि विशालकाय यज्ञायोजन होना चाहिए। फिर आहार में से छोटे पाँच कण निकल कर आहुति दे देने मात्र की, दो मिनट में हो जाने वाली क्रिया में महायज्ञ नाम क्यों दिया गया? इतना ही नहीं हर आहुति को महायज्ञ की संज्ञा दी गई ऐसा क्यों? इसका तात्पर्य किसी अत्यधिक विशालकाय धर्मानुष्ठान जैसी व्यवस्था होने जैसा ही कुछ निकलता है। कुछ भी हो इतने छोटे कृत्य का इतना बड़ा नाम अनबूझ पहेली जैसी लगता है।

वस्तु स्थिति का पर्यवेक्षण करने से तथ्य सामने आ जाते हैं। स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ कृत्य के स्थान पर तथ्य को प्रमुखता दी गयी है। दृश्य के स्थान पर रहस्य को-प्रेरणा प्रकाश को-ध्यान में रखा गया है। साधारणतया दृश्य को कृत्य की प्रमुखता देते हुए नामकरण किया जाता है। किन्तु बलि-वैश्व की पाँच आहुतियों के पीछे जो प्रतिपादन जुड़े हुए हैं, इन पाँचों को एक स्वतन्त्र यज्ञ नहीं-महायज्ञ माना गया है। स्पष्टीकरण के लिए हर आहुति का एक-एक स्वतन्त्र नाम भी दे दिया है।

पाँच आहुतियों को जिन पाँच यज्ञों का नाम दिया गया है उनमें शास्त्री मतभेद पाया जाता है। एक ग्रन्थ में जो पाँच नाम गिनाए गए हैं दूसरे में उससे कुछ भिन्नता है। इन मतभेदों के मध्य अधिकाँश की सहमति को ध्यान में रखा जाय तो इनके अधिकाँश की सहमति को ध्यान में रखा जाय तो इनके नाम-

*(1) ब्रह्म यज्ञ*
*(2) देव यज्ञ*
*(3) ऋषि यज्ञ*
*(4) नर यज्ञ*
*(5) भूत यज्ञ*
ही प्रमुख रह जाते हैं। मोटी मान्यता यह है कि जिस देव के नाम पर आहुति दी जाती है, वे उसे मिलती हैं। फलतः वह प्रसन्न होकर यजनकर्ता को सुख-शान्ति के लिए वरदान प्रदान करते हैं।

देवता शब्द का तात्पर्य समझने में प्रायः भूल होती रही है। देवता किसी अदृश्य व्यक्ति जैसी सत्ता माना जाता है पर वस्तुतः बात वैसी है नहीं। देवों का तात्पर्य किन्हीं भाव शक्तियों से है जो चेतना तरंगों की तरह इस संसार में एवं प्राणियों के अन्तराल में संव्याप्त रहती है। साधारणतया वे प्रसुप्त पड़ी रहती हैं और मनुष्य सत्शक्तियों-सद्भावनाओं से-और सत्प्रवृत्तियों से रहित दिखाई पड़ती है। इस प्रसुप्ति को जाग्रति में परिणत करने पाले प्रयासों को देवाराधना कहा जाता है। देव वृत्तियों के विकसित होने का अनुदान ही साधक को ऋद्धियों-सिद्धियों, सफलताओं,
सुख-सम्पदाओं जैसी विभूतियों से सुसंपन्न करता है।

पंच महायज्ञों में जिन ब्रह्म, देव, ऋषि आदि का उल्लेख है उनके निमित्त आहुति देने का अर्थ इन्हें अदृश्य व्यक्ति मानकर भोजन कराना नहीं, वरन् यह है कि इन शब्दों के पीछे जिन देव-वृत्तियों का सत्प्रवृत्तियों का संकेत है उनके अभिवर्धन के लिए अंशदान करने की तत्परता अपनाई जाय।

*(1) ब्रह्म यज्ञ* का अर्थ है -ब्रह्म -ज्ञान, आत्म-ज्ञान की प्रेरणा। ईश्वर और जीवन के बीच चलने वाला आदान-प्रदान।

*(2) देव यज्ञ* का उद्देश्य है-पशु से मनुष्य तक पहुँचाने वाले प्रगतिक्रम को आगे बढ़ाना। देवत्व के अनुरूप गुण कर्म स्वभाव का विकास-विस्तार। पवित्रता और उदारता का अधिकाधिक सम्वर्धन।

*(3) ऋषि यज्ञ* का तात्पर्य है-पिछड़ों को उठाने में संलग्न करुणार्द्र जीवन नीति। सदाशयता के सम्वर्धन की तपश्चर्या।

*(4) नर यज्ञ* की प्रेरणा है-मानवीय गरिमा के अनुरूप वातावरण एवं समाज व्यवस्था का निर्माण। मानवीय गरिमा का संरक्षण। नीति और व्यवस्था का परिपालन। विश्व मानव का श्रेय साधन।

*(5) भूत यज्ञ* की भावना है-प्राणि मात्र तक आत्मीयता का विस्तार। अन्यान्य जीव धारियों तक के विकास का प्रयास।

इन पाँचों प्रवृत्तियों में व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति, पवित्रता और सुव्यवस्था के सिद्धान्त जुड़े हुए हैं। उन्हें उदात्त जीवन नीति के सूत्र कह सकते हैं। जीवन-चर्या और समाज व्यवस्था में इन सिद्धान्तों का जिस अनुपात से समावेश होता जाएगा, उसी क्रम से सुखद परिस्थितियों का निर्माण, निर्धारण होता चला जाएगा। बीज छोटा होता है किन्तु उसका फलितार्थ विशाल वृक्ष बनकर सामने आता है। चिंगारी छोटी होती है अनुकूल अवसर मिलने पर वही दावानल का रूप ले लेती है। गणित के सूत्र छोटे से होते हैं, पर उससे जटिलताएँ सरल होती चली जाती हैं।

बलि-वैश्व की पाँच आहुतियों का दृश्य स्वरूप तो तनिक-सा है पर उनमें जिन *पाँच प्रेरणा सूत्रों का समावेश है उन्हें व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति के आधार भूत सिद्धान्त कहा जा सकता है। इनकी स्मृति हर रोज ताजा होती रहे इसके लिए पाँच आहुतियाँ देकर पाँच आदर्शों को कहते हैं। प्रस्तुत पाँच महायज्ञों के पाँच अधिष्ठाता देवता माने गए हैं। ब्रह्म यज्ञ के ब्रह्म, देव यज्ञ के विष्णु ऋषि यज्ञ के महेश, नर यज्ञ के अग्नि और भूत यज्ञ के वरुण देवता अधिपति हैं। पाँच आहुतियाँ इन्हीं पाँचों के लिए दी जाती हैं।*

*इस प्रक्रिया में इन पाँच देवों का पूजन-अनुकूलन का भाव है। यज्ञकर्ता बलि वैश्व कर्म करते हुए इन पाँचों के अनुग्रह वरदान की अपेक्षा करता है। यह आशा तब निःसन्देह पूरी हो सकती है जब आहुतियों के पीछे जो उद्देश्य निहित है उसे व्यवहार में उतारा जाय। इन्हीं उत्कृष्टताओं का व्यापक प्रचलन अवलम्बन इस पंच महायज्ञ प्रक्रिया का मूलभूत प्रयोजन है। बलि-वैश्व को इन्हीं देव-प्रेरणाओं का प्रतिपादन पाँच महायज्ञों के रूप में किया गया है उन्हें मानवी गरिमा को समुन्नत बनाने वाले पंचशील कह सकते हैं। बौद्ध धर्म में पंचशीलों का बहुत ही विस्तार पूर्वक वर्णन विवेचन किया गया है। इन पंचशीलों को जीवनचर्या एवं समाज व्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में वर्गीकृत किया गया है। इस प्रकार पंचशीलों के वर्ग उपवर्ग प्रकारान्तर से व्यक्ति एवं विश्व की समस्त समस्याओं को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका संपन्न करते हैं।*

*शरीर रक्षा के पंचशील हैं-*

(1) सीमित एवं सात्विक आहार
(2) स्वच्छ जल का पर्याप्त उपयोग
(3) खुली वायु में गहरी साँस
(4) समुचित श्रम
(5) चिन्ता रहित रात्रि विश्राम।

*मानसिक स्वास्थ्य* के पंचशील हैं-

(1) खिलाड़ी जैसा दृष्टिकोण
(2) अनवरत मुस्कान
(3) इन्द्रिय निग्रह
(4) काम में मनोयोग एवं गौरव
(5) उपलब्धि में सन्तोष-प्रगति में उत्साह।

*सामाजिक पंचशील* हैं-
(1) ईमानदारी
(2) नागरिकता की जिम्मेदारी
(3) नम्र, शिष्ट एवं मधुर व्यवहार
(4) वचन का पालन
(5) उदार सहयोग।

*पारिवारिक पंचशील* हैं-
(1) अभिभावकों के प्रति सहयोग, कृतज्ञता, सेवाभावना
(2) छोटों को दुलार, सहयोग
(3) दाम्पत्य सम्बन्धों में साधन मैत्री
(4) सत्प्रवृत्तियों को सम्पन्नता मानना और उन्हें बढ़ाना
(5) सन्तान संख्या न्यूनतम।

*धार्मिक पंचशील* हैं-
(1) सत्प्रवृत्तियों का समर्थन संवर्धन
(2) दुष्प्रवृत्तियों से असहयोग, संघर्ष
(3) पीड़ा और पतन के निवारण में बढ़-चढ़कर समय, श्रम, सम्पदा का नियोजन
(4) उच्च स्तरीय आस्थाओं को दृढ़तापूर्वक अपनाना
(5) कर्तव्य पालन में तत्परता, अधिकार पाने में उदासीनता।

*अध्यात्मिक पंचशील* हैं-
(1) ईश्वर की कर्मफल व्यवस्था पर अटूट विश्वास
(2) आत्मावलम्बन
(3) औसत भारतीय स्तर का जीवन सत्प्रयोजनों में उपयोग
(4) जीवन साधना में प्रखर तत्परता
(5) आत्मीयता का चरम विस्तार।

*उपरोक्त वर्ग विभाजनों में जिन पंचशीलों की चर्चा की गई है, वे देखने में एक दूसरे से पृथक लगते हैं और उन्हें स्वतन्त्र आदर्श गिनने का मन करता है। पर गहराई से देखने पर प्रतीत होगा कि उनमें बलि वैश्व में प्रतिपादित ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, ऋषियज्ञ, नरयज्ञ और भूतयज्ञ में सन्निहित सद्भावनाओं और उत्कृष्ट मान्यताओं का परिस्थितियों के अनुरूप विवेचन दिग्दर्शन मात्र है। मानवी प्रगति, सुव्यवस्था, सुरक्षा एवं सुख, शान्ति के समस्त तत्व इस पंचशील प्रक्रिया में पूरी तरह जुड़े है जिन्हें पंचशील प्रक्रिया में पूरी तरह जुड़े है जिन्हें पंच महायज्ञों के नाम से पाँच आहुतियों के साथ जोड़कर रखा गया हैं। कहना न होगा कि ये आदर्श जिस अनुपात में अपनाये जायेंगे, उसी के अनुरूप व्यक्ति में देवत्व की मनः स्थिति और संसार में स्वर्गीय परिस्थिति का मंगलमय वातावरण दृष्टिगोचर होगा। बलि-विश्व की प्रेरणाएँ प्रकारान्तर से नवयुग की सुखद सम्भावनाओं का बीजारोपण करती है।*

अखण्ड ज्योति फरवरी 1993
[07/04, 10:20 PM] Savitanandmishra: *मंगल+शनि योगफल तथा उपाय*
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कुंडली में शनि मंगल का योग करियर के लिए संघर्ष देने वाला होता है करियर की स्थिरता में बहुत समय लगता है और व्यक्ति को बहुत अधिक पुरुषार्थ करने पर ही करियर में सफलता मिलती है शनि मंगल का योग व्यक्ति को तकनीकी कार्यों जैसे इंजीनियरिंग आदि में आगे ले जाता है और यह योग कुंडली के शुभ भावों में होने पर व्यक्ति पुरुषार्थ से अपनी तकनीकी प्रतिभाओं के द्वारा सफलता पाता है, शनि मंगल का योग यदि कुंडली के छटे या आठवे भाव में हो तो स्वास्थ में कष्ट उत्पन्न करता है शनि मंगल का योग विशेष रूप से पाचनतंत्र की समस्या, जॉइंट्स पेन और एक्सीडेंट जैसी समस्याएं देता है।

मंगल ग्रह युवा, चुस्त, बलिष्ठ, छोटे कद वाला, रक्त-गौर वर्ण, पित्त प्रकृति, शूरवीर, उग्र, रक्त नेत्र वाला, और गौरवशाली ग्रह है। इसके विपरीत शनि दुर्बल, लंबा शरीर, रूखे बाल, मोटे दांत और नाखून वाला, दुष्ट, क्रोधी, आलसी और वायु प्रकृति वाला ग्रह है। कुंडली में बलवान शनि सुखकारी तथा निर्बल या पीड़ित शनि कष्टकारक और दुखदायी होता है। इन विपरीत स्वभाव वाले ग्रहों का योग स्वभावतः भाव स्थिति संबंधी उथल-पुथल पैदा करता है। सभी ज्योतिष ग्रंथों ने इस योग का फल बुरा ही बताया है। कुछ आचार्यों ने इसे ‘द्वंद्व योग’ की संज्ञा दी है। ‘द्वंद्व’ का अर्थ है लड़ाई। यह योग लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में होने पर मंगल दोष को अधिक अमंगलकारी बनाता है जिसके फलस्वरूप जातक के जीवन में विवाह संबंधी कठिनाइयां आती हैं। विवाह के रिश्ते टूटते हैं, विवाह देर से होता है, विवाहोत्तर जीवन अशांत रहता है, तथा विवाह विच्छेद तक की स्थिति पैदा हो जाती है।

फलदीपिका’ ग्रंथ (अ. 18.3) के अनुसार: दुःखार्तोऽसत्य संधः ससवितृ तनये भूिमजे निन्दिश्च। अर्थात् ‘‘मंगल-शनि साथ हों तो व्यक्ति दुःखी, झूठ बोलने वाला, अपने वचन से फिर जाने वाला और निंदित होता है।’’ ‘सारावली’ ग्रंथ (अ. 15.6) के अनुसार: धात्विन्द्रजाल कुशल प्रवन्चक स्तेय कर्म कुशलश्च। कुजसौरयोर्विधर्मः शस्त्रविषघ्नः कलिरूचिः स्यात्।। अर्थात, ‘‘ कुंडली में मंगल और शनि एक साथ होने पर जातक धातुविशेषज्ञ, धोखेबाज, लड़ाकू, चोर, शस्त्राघाती तथा विष संबंधी ज्ञान रखता है। ‘जातक भरणम्’ (द्विग्रह योगाध्याय, श्लोक-15) के अनुसार: शस्त्रास्त्र वित्संगर कर्मकर्ता स्तेयानृतप्रीतिकरः प्रकामम्। सौरव्येन हीनो नितरां नरः स्याद्ध रासुते मन्दयुतेऽतिनिन्द्यः।। अर्थात्, ‘‘जिसके जन्म समय मंगल और शनि का योग हो, वह अस्त्र-शस्त्र चलाने वाला, चोरी में तत्पर, मिथ्या बोलने वाला और सुख हीन होता है।

‘मानसागरी’ ग्रंथ (द्विग्रहयोग शनि-मंगल द्वंद्व योग फल) अनुसार: वाग्मीन्द्रजालदक्षश्च विधर्मी कलहप्रियः। विषमद्य प्रपंचाढ्यो मंदमंगल संगमे।। अर्थात्, ‘‘मंगल-शनि के योग से व्यक्ति वक्ता तथा इंद्रजाल विद्या में निपुण, धर्महीन, झगड़ालू, विष तथा मदिरा के प्रपंच से युक्त होता है।

‘होरासार’ ग्रंथ (अ. 23.19) के अनुसार: कुजमन्दयास्तु योगे नित्यार्तो वातपित्त रोगाभ्याम्। उपचय भवने नैव नृपतुल्यो लोक संपतः स्यात्ः।। अर्थात्, ‘‘मंगल और शनि की एक भाव में युति वात (गठिया) और पित्त रोग देती है। परंतु उपचय (3, 6, 10,11) भाव में यह युति जातक को सर्वमान्य बनाती है और राज सम्मान देती है। ज्ञातव्य है कि पापी ग्रह उपचय भाव में शुभ फल देते हैं।

‘संकेतनिधि’ ग्रंथ (संकेत IV.66) के अनुसार। द्यूने यमेऽसृजि तदीक्षणतश्च वातार्ता। चंचला सरूधिरा कटि चिन्ह युक्ता।। अर्थात् ‘‘यदि शनि-मंगल सातवें भाव में हों या वहां दृष्टिपात करें तब पत्नी अस्थिर बुद्धि और वात रोग से ग्रस्त होती है। उसको रूधिर की अधिकता होती है और उसके कटि प्रदेश में चिह्न होता है।

ज्योतिष का हर जानकार शनि ग्रह को धरती पर होने वाली सभी बुरी घटनाओ का प्रतीक व कारक मानता हैं संसार मे होने वाले कष्ट , दुख , संताप , मृत्यु , अपंगता, विकलता , दुष्टता ,पतन , युद्ध , क्रूरता भरे कार्य , अव्यवस्था, विद्रोह इत्यादि का कारक ग्रह यह शनि ही माना जाता हैं किसी की भी कुंडली मे इसकी स्थिति बहुत महत्व रखती हैं जैसे यह कहा जा सकता हैं की दूसरे भाव मे शनि वैवाहिक जीवन व धन हेतु अशुभ होता हैं जबकि चतुर्थ भाव मे यह कष्टपूर्ण बचपन का प्रतीक बनता हैं इसी प्रकार दशम भाव का शनि पाप प्रभाव मे होने से अपनी दशा मे जातक को ऊंचाई से गिराता हैं अथवा ऊंचे पद से धरातल मे ले आता हैं | इस शनि का सूर्य चन्द्र से सप्तम मे होना हमेशा बुरे परिणाम देता हैं वही गुरु के साथ होने पर यह शनि गुरु दशा मे परेशानी अवश्य प्रदान करता हैं।

इसी प्रकार मंगल ग्रह को धरती पर होने वाले विस्फोटो , हमलो , अग्निकांडों , युद्धो , भूकंपो इत्यादि का कारक माना जाता हैं जातक विशेष की पत्रिका मे यह मंगल दोष के अतिरिक्त कुछ अन्य भावो मे भी हानी ही करता हैं जैसे तृतीय भाव मे यह भात्र सुख मे कमी प्रदान कर अत्यधिक साहसी प्रवृति देता हैं तथा पंचम भाव मे यह तुरंत निर्णय लेने की घातक सोच प्रदान करता हैं।

हमारे ज्योतिष शास्त्रो मे शनि मंगल के संबंध वाले जातक के विषय निम्न बातें कही गयी हैं “ऐसा जातक वक्ता , जादू जानने वाला, धैर्यहीन, झगड़ालू , विष व मदिरा बनाने वाला, अन्याय से द्रव प्राप्ति करने वाला, कलहप्रिय , सुख रहित , दुखी निंदित ,झूठी प्रतिज्ञा करने वाला अर्थात झूठा होता हैं | हमने अपने अध्ययन मे काफी हद तक यह बातें सही पायी हैं इसके अतिरिक्त भी कुछ अन्य बातें हमें अपने इस अध्ययन के दौरान प्राप्त हुयी।

इन दोनों ग्रहो का एक अजीब सा रिश्ता हैं मंगल जहां शनि के घर मे ऊंच का होता हैं वही शनि मंगल के घर मे नीच का हो जाता हैं यह दोनों एक मात्र ऐसे ग्रह हैं जो समसप्तक हुये बिना भी एक दूसरे से दृस्टी संबंध बना सकते हैं | ऐसे मे इन दोनों ग्रहो की युति अथवा दृस्टी जातक विशेष की कुंडली मे क्या परिणाम देती हैं आइए कुछ कुंडलियो द्वारा जानने का प्रयास करते हैं।

1👉 यह संबंध जातक विशेष को आत्महत्या करने पर मजबूर करता हैं | उदाहरण के लिए निम्न कुण्डलिया देखी जा सकती हैं।

👉 श्री राम जी की कर्क लग्न की पत्रिका मे शनि और मंगल (सप्तमेश-अष्टमेश व पंचमेश-कर्मेश ) की लग्न व दशम भाव पर दृस्टी हैं जिनके मिले जुले प्रभावों से सभी जानते हैं की श्री राम ने जलसमाधि लेकर आत्महत्या करी थी।*

👉 29/4/1837 को मिथुन लग्न मे जन्मे इस ने जातक फ्रांसीसी सेना मे जनरल के पद पर रहते हुये फ्रांस के युद्धो मे बहुत नाम कमाया था 1889 मे इन्हे शत्रुतापूर्ण कारवाई के चलते पद से हटा दिया गया 1890 मे इनकी पत्नी की भी मृत्यु हो गयी जिससे निराश होकर इन्होने 30/9/1891 मे आत्महत्या कर ली थी | इनकी पत्रिका मे भी मंगल शनि का दृस्टी संबंध हैं।

👉 हिटलर (20/4/1889) तुला लग्न की इस पत्रिका मे शनि मंगल का दृस्टी संबंध हैं जो सप्तमेश चतुर्थेश का संबंध हैं जिससे हिटलर को सिंहासन व पद प्राप्ति की अदम्य असंतुष्टि की भावना प्राप्त हुई और वह अपनी तानाशाही प्रवृति की और उन्मुख होकर विश्व मे विवादित व्यक्ति के रूप मे जाना गया इन्ही ग्रहो के लग्न पर प्रभाव ने उसे आत्महत्या करने को मजबूर किया।

इन सभी उदाहरणो से यह स्पष्ट हो जाता हैं की शनि मंगल का संबंध सच मे ही एक विध्वंशक संबंध हैं जो कुंडली मे जातक विशेष के अतिरिक्त धरती पर भी अपना विध्वंशक प्रभाव ही देता हैं।

शनि को कार्य के लिये और मंगल को तकनीक के लिये माना जाता है। शनि का रंग काला है तो मंगल का रंग लाल है,दोनो को मिलाने पर कत्थई रंग का निर्माण होजाता है। कत्थई रंग से सम्बन्ध रखने वाली वस्तुयें व्यक्ति स्थान पदार्थ सभी शनि मंगल की युति में जोडे जाते है। शनि जमा हुआ ठंडा पदार्थ है तो मंगल गर्म तीखा पदार्थ है,दोनो को मिलाने पर शनि अपने रूप में नही रह पाता है जितना तेज मंगल के अन्दर होता है उतना ही शनि ढीला हो जाता है।

इस बात को रोजाना की जिन्दगी में समझने के लिये घर मे बनने वाली आलू की सब्जी के लिये सोचिये,आलू की सिफ़्त शनि में जोडी जाती है कारण जमीन के अन्दर से यह सब्जी उगती है जड के रूप में इसका आस्तित्व है,जब निकाला जाता है तो जमा हुआ पानी और अन्य पदार्थों का मिश्रण होता है। यह सूर्य की गर्मी से सड जाता है इसके लिये इसे कोड स्टोरेज में रखा जाता है और समय पर निकाल कर इसे प्रयोग में लाया जाता है,सब्जी बनाते वक्त इसे छिलके को निकाल कर मिर्च मशाले आदि के साथ सब्जी के रूप में पकाया जाता है जितनी गर्मी इसे दी जायेगी उतना ही पतला यह पक जायेगा,लेकिन अपने अन्दर के पानी के अनुसार ही यह ढीला या कडक बनेगा,भोजन के समय इसे प्रयोग करने पर अपने रूप परिवर्तन से आराम से खाया जा सकता है। अगर इसे गर्म नही किया जाये तो यह पकेगा नही और कसैला स्वाद देगा और खाया भी नही जायेगा। सीधे आग में डालने पर यह जल जायेगा,फ़्लेम वाली आग में यह पकेगा नही,जितनी मन्दी आग से इसे पकाया जायेगा उतना ही स्वादिष्ट बनेगा।

दूसरा उदाहरण मंगल की भोजन में प्रयोग की जाने वाली मिर्च से भी लिया जाता है,जब मिर्च अधिक हो जाती है तो शरीर के अन्दर जमा हुआ कफ़ जो शनि के द्वारा पैदा किया जाता है पिघलना शुरु हो जाता है,जितनी अधिक मिर्च खायी जाती है उतना अधिक कफ़ शरीर से पिघलना शुरु हो जाता है,यहां तक कि अगर अधिक मिर्ची खायी जाये तो शरीर में जलन पैदा हो जाती है,शरीर में वसा के रूप में जमा शनि का पदार्थ पिघल कर आन्सू की रूप में कफ़ के रूप में नाक के रूप में पेशाब के समय चर्बी के रूप में मल को पतला करने के बाद दस्त के रूप में निकल जायेगा,अधिक मिर्च के प्रयोग करने पर यह शरीर की रक्षा के रूप में उपस्थित और सर्दी गर्मी से शरीर को बचाने वाले पदार्थ को शरीर से निकाल कर बाहर कर देगी। उसी प्रकार से धीमी आंच पर रखा हुआ पानी भी भाप की शक्ल में बर्तन से विलीन हो जायेगा। यह मंगल की सिफ़्त है। एक बात और भी मानी जाती है कि शनि का स्थान गन्दी जगह पर होता है और मंगल का स्थान गर्म जगह पर होता है,जिन जातकों की कुंडली में शनि मंगल की युति होती है उनका खून किसी न किसी प्रकार के इन्फ़ेक्सन से युक्त होता है।

शनि के अन्दर एक बात और देखी जाती है कि वह जड है उसे कोई भान नही है,जैसे सूर्य देखने की क्षमता रखता है चन्द्र सोचने की क्षमता को रखता है मंगल हिम्मत को दिखाने की क्षमता को रखता है बुध गन्द को सूंघने की क्षमता को रखता है,गुरु सुनने और काम शक्ति के विकास की क्षमता को रखता है शुक्र स्पर्श से समझने की क्षमता का रूप होता है,राहु आकस्मिक घटना को देने की ताकत को रखता है तो केतु स्वभाव से ही सहायता के लिये सामने होता है,लेकिन शनि जड है उसे जैसा साधनों से बनाया ज

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